
मिडिल-ईस्ट में 'अमन' के नाम पर ट्रंप की पैंतरेबाजी को ईरान ने कुचल डाला, अमेरिकी गेम प्लान ध्वस्त
AajTak
डोनाल्ड ट्रंप को खुद को बहुत बड़ा खिलाड़ी समझ रहे थे. लेकिन, ईरान-इजरायल में उलटे पड़ते उनके पैंतरों से साबित होता जा रहा है कि उन्हें खुद खुद अंदाजा नहीं होता है कि उनके फैसलों का भविष्य क्या होगा. अमेरिका में 60% जनता मध्य पूर्व में युद्ध के उनके फैसले के खिलाफ थी. अब सीजफायर के बाद ईरान के सुप्रीम लीडर खामेनेई उनकी लू उतार रहे हैं.
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप बड़बोले जरूर हैं पर अमेरिका के हित में किसी भी तरह का फैसला लेने के लिए हर वक्त हर तरह के फैसले लेने के लिए तैयार बैठे होते हैं. अब ये अलग बात है कि उनके फैसलों से अमेरिका का कितना हित होता है या कितना नुकसान, वो खुद भी नहीं समझते हैं. ट्रंप का ईरान के प्रति व्यवहार जिस तरह अचानक बदला है वह हैरान करने वाला है. अमेरिकी प्रतिबंधों में हाल के नरम रुख, ईरान की जंग में बहादुरी की तारीफ और तेल निर्यात प्रतिबंधों को हटाने की संभावना जताना बेहद आश्चर्यजनक फैसले हैं. 22 जून 2025 को ईरान के परमाणु ठिकानों (फोर्डो, नटंज, और इस्फहान) पर अमेरिकी हवाई हमलों के बाद ट्रंप का यह फैसला अप्रत्याशित लगता है. जाहिर है कि ट्रंप का यह नरम रवैया यूं ही नहीं है; यह एक रणनीतिक कदम है, जो परमाणु वार्ता, वैश्विक तेल बाजार, क्षेत्रीय भू-राजनीति, और घरेलू राजनीतिक दबाव से प्रेरित है. हालांकि ईरान के सर्वोच्च नेता अली खामनेई पर ट्रंप के सहृदयता वाले बयानों का रत्ती भर असर नहीं है. खामनेई ने आज फिर अमेरिका और ट्रंप के खिलाफ जहर उगला है.
24 जून 2025 को, ट्रंप ने Truth Social पर लिखा था कि चीन को ईरान से तेल खरीदने की अनुमति दी जा सकती है. इतना ही नहीं उन्होंने ईरान की स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को बंद न करने की सराहना की. अगले दिन, नीदरलैंड्स में नाटो समिट में भी यह क्रम रुका नहीं. उन्होंने जंग में बहादुरी के लिए भी ईरान की तारीफ की और सुझाव दिया कि वह अपने तेल संसाधनों से आर्थिक पुनर्निर्माण करे .
1-ट्रंप के नरम पड़ने के रणनीतिक कारण
ट्रंप का पहला लक्ष्य ईरान को परमाणु हथियार बनाने से रोकना है. इसके लिए उनका उद्देश्य ईरान को कूटनीति की मेज पर लाना है. 25 जून को फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रो ने संकेत दिया कि अगले कुछ हफ्तों में अमेरिका, यूरोप, और ईरान के बीच परमाणु वार्ता शुरू हो सकती है. ट्रंप ने 13 मई 2025 को सऊदी अरब में ईरान को शांति की प्रक्रिया में शामिल होने का न्योता दिया था.
इसके साथ ही ट्रंप ने बार-बार तेल की कीमतों को कम रखने की मांग की है, क्योंकि तेल की बढ़ती कीमतें अमेरिकी मतदाताओं के बीच नेताओं की लोकप्रियता को घटाती हैं . ईरान, OPEC का तीसरा सबसे बड़ा तेल उत्पादक है. वो प्रतिदिन 1.6 मिलियन बैरल तेल निर्यात करता है. मुख्य रूप से चीन को. इजरायल-ईरान युद्ध के दौरान तेल की कीमतें पांच महीने के उच्चतम स्तर पर थीं, लेकिन युद्धविराम और ट्रंप के तेल निर्यात की अनुमति की बात से कीमतें 6-8% गिर गईं. जाहिर है कि अमेरिकी जनता के लिए यह सुखद संदेश जैसा रहा होगा.
अमेरिका में 60% जनता मध्य पूर्व में युद्ध के खिलाफ थी. ट्रंप ने परमाणु ठिकानों पर हमले बिना कांग्रेस की मंजूरी लिए किए. जिसे डेमोक्रेट सीनेटरों ने असंवैधानिक बताया था. यह घरेलू दबाव ट्रंप को कूटनीति और नरम रुख की ओर ले जा रहा है, ताकि वह युद्ध-विरोधी मतदाताओं का समर्थन बनाए रखें.

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ईरान को होर्मुज पर धमकी अब उन्हीं पर उलटी पड़ चुकी है. ट्रंप ने ईरान को 48 घंटे की डेडलाइन देकर होर्मुज खोलने को कहा था, जिसके बाद अब ईरान ने ट्रंप के स्टाइल में ही उन्हें जवाब देते हुए कहा कि यदि अमेरिका उनपर हमला करेगा तो ईरान भी अमेरिका के एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर को निशाना बनाएगा.

आज यु्द्ध का 24वां दिन है. इजरायल पर ईरान और जवाब में अमेरिका और इजरायल के ईरान पर ताबड़तोड़ हमले जारी हैं. इस बीच सवाल ये कि क्या डोनाल्ड ट्रंप हॉर्मुज पर फंस गए हैं. ट्रंप के बार-बार बदलते बयानों से लग रहा है कि जंग छेड़ने से पहले हॉर्मुज को लेकर ट्रंप सोच नहीं पाए थे. देखें कैसे बदलते जा रहे ट्रंप के बयान.











