
गणपति विसर्जन सही या गलत? क्यों उत्तर भारत में इस परंपरा को लेकर उठते हैं सवाल?
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महाराष्ट्र समेत देशभर में गणपति की स्थापना के बाद उनका विसर्जन भी किया जाता है, लेकिन उत्तर भारतीय मत है कि श्रीगणेश का विसर्जन नहीं करना चाहिए. गणेशजी के विसर्जन को लेकर क्या है सवाल और उसकी सही वजह?
भाद्रपद महीने की चतुर्थी तिथि से चतुर्दशी तिथि तक का समय देशभर में गणेश उत्सव के तौर पर मनाया गया. घर-मंदिर, गली, चौक और चौबारे में बप्पा की स्थापना हुई और उनके भजन-कीर्तन, आरती आदि से दिशाएं गूंजती रहीं. दस दिन के इस उत्सव के बाद अब समय है विसर्जन का. चतुर्थी तिथि को गणपति की स्थापना के बाद चतुर्दशी तिथि में उनका विसर्जन किया जाता है और इसकी परंपरा बनी हुई है. हालांकि गणपति विसर्जन का समय श्रद्धालु अपनी सहूलियत और श्रद्धा के अनुसार निर्धारित करते हैं. जिसमें श्रद्धालु 1, 5, 7 या पूरे 10 दिन तक गणपति की स्थापना करते हुए इसी अनुसार विसर्जन करते हैं. अनंत चतुर्दशी का दिन गणेश प्रतिमाओं के विसर्जन का दिन भी माना जाता है.
गणपति विसर्जन को लेकर उठते प्रश्न लेकिन... गणपति स्थापना के साथ-साथ हर साल विसर्जन को लेकर भी प्रश्न उठने लगते हैं. दरअसल गणेश प्रथम पूज्य और लोकदेवता हैं. लोकायत दर्शन भी उन्हें लोक के प्रतीक के रूप में स्थापित करता है, जहां वह सामाजिक जरूरतों के अनुसार अपने आप ही लोकनायक और विनायक बन जाते हैं, इस तरह उन्हें गणपति कहा जाता है, लेकिन विसर्जन को लेकर अलग-अलग मत इसलिए हैं, क्योंकि श्रीगणेश शुभ-लाभ देने वाले, ऋद्धि-सिद्धि देने वाले और धन के साथ बुद्धि-विद्या के भी दाता है. इसलिए वह इन सभी शुभ लक्षणों के प्रतीक भी हैं.
क्या है उत्तर भारत में लोगों का मत उत्तर भारतीय लोगों और विद्वानों का मत कहता है कि श्रीगणेश का विसर्जन नहीं करना चाहिए, क्योंकि अगर उनका विसर्जन किया गया, यानी बुद्धि, विद्या, धन-संपदा का अपने हाथों से विसर्जन कर दिया. यहां विसर्जन का अर्थ विदा कर देना और अपने से दूर कर देना लगा लिया जाता है. तब साधारण भाषा में कहा जाता है कि गणेश जी का ही विसर्जन कर दिया तो हर दिन की प्रथम पूजा में गणेश जी की पूजा कैसे होगी?
इन तमाम तर्कों का पहला उत्तर तो यह है कि गणेश चतुर्थी महाराष्ट्र और अन्य दक्षिण भारतीय राज्यों का प्रमुख त्योहार है. भाद्रपद मास की गणेश चतुर्थी के दिन पूजन करने की मान्यता इन क्षेत्रों में प्राचीन काल से रही है. हालांकि लंबे समय तक ये सिर्फ घर में होने वाली एक व्रत-पूजा थी, जिसमें मिट्टी-हल्दी, दूध से हथेली के आकार की गणेश प्रतिमाएं बनाई जाती थीं और फिर पूरे परिवार के सदस्य मिलकर उनकी पूजा करते थे. छत्रपति शिवाजी के समय में मराठा साम्राज्य गणेश चतुर्थी को एक उत्सव की तरह मनाने लगा था. पेशवाई के समय भी गणेश उत्सवों के बड़े आयोजनों के उदाहरण मिलते हैं, हालांकि ये तब तक घर और मंदिरों तक ही सीमित थे.
आजादी के आंदोलन से घर-घर पहुंचा गणपति समारोह स्वतंत्रता आंदोलन के समय देश में इसके समानांतर ही धार्मिक आंदोलनों की लहर भी जारी थी. जहां उत्तर भारत में श्रीराम-श्रीकृष्ण की लीलाओं-कहानियों के आयोजन बड़े पैमाने पर होने लगे थे, ठीक इसी तर्ज पर लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने गणेश उत्सव को भी सार्वजनिक तौर पर लोगों के बीच ले जाने का विचार रखा. उन्होंने इस आयोजन को बड़े पैमाने पर मनाने की शुरुआत की. गणेश पूजा की शुरुआत पुणे से हुई और तब से ही पंडाल सजाकर उसमें प्रतिमा स्थापित करके गणेश चतुर्थी आयोजन किया जाने लगा.

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