
सब उड़ जाएगा सिर्फ सैलरी ही रहेगी... दफ्तर में हम 90 घंटे काम तो कर लें नारायणमूर्ति जी! लेकिन...
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इंफोसिस के को-फाउंडर एनआर नारायणमूर्ति ने अलग अलग कंपनियों में काम करने वाले कर्मचारियों सप्ताह में 70 घंटे काम करने की सलाह दी है. सवाल ये है कि अगर कर्मचारी अपने को दफ्तर में खपा देगा तो फिर उसकी पर्सनल लाइफ का क्या होगा?
देश की अर्थव्यवस्था कैसी है? उसे सुधारने के लिए क्या प्रबंध किये जा सकते हैं? अर्थव्यवस्था के मद्देनजर युवा कर्मचारियों की क्या क्या जिम्मेदारियां होनी चाहिए? इन मुद्दों पर देश में रोजाना कहीं न कहीं बैठक, सेमिनार होता है. पॉडकास्ट किये जाते हैं. स्पीकर्स आते हैं. मन की बात कहते हैं. और यहां प्रोडक्टिविटी बढ़ाने से लेकर काम के घंटे ज्यादा करने तक ऐसी तमाम बातें होती हैं जो अत्यधिक कर्मठ और जोशीले कर्मचारियों को तो अच्छी लगती है. मगर उन कर्मचारियों को आहत कर देती है जो इसके पक्षधर हैं कि यदि इंसान दफ्तर में समय दे रहा है, तो उसे उतना ही समय अपने घर पर भी देना चाहिए.
काम और वर्क कल्चर को लेकर हुए ऐसे ही एक पॉडकास्ट ने विवाद खड़ा कर दिया और सोशल मीडिया पर शुरू हुई ये लड़ाई इनफ़ोसिस फाउंडर एनआर नारायण मूर्ति बनाम कॉमेडियन वीर दास हो गई है.
दरअसल अभी बीते दिनों ही 3one4 कैपिटल के पॉडकास्ट, 'द रिकॉर्ड" के उद्घाटन एपिसोड पर बोलते हुए इनफ़ोसिस फाउंडर एनआर नारायण मूर्ति नेइस बात पर बल दिया कि जब तक देश के युवा लंबे समय तक काम करने के लिए प्रतिबद्ध नहीं होते, तब तक भारत उन अर्थव्यवस्थाओं के साथ तालमेल बनाए रखने के लिए संघर्ष कर सकता है, जिन्होंने पिछले कुछ दशकों में उल्लेखनीय प्रगति की है.
आसान शब्दों में समझें तो नारायण मूर्ति यही मानते हैं कि देश और अर्थव्यवस्था तभी सही से चल सकते हैं जब अलग अलग कंपनियों में काम करने वाला युवा अपना पूरा समय दफ्तर को दे. बाकी सारी चीजों से ध्यान हटाकर अपना पूरा फोकस सिर्फ काम पर रखे. इस बात में भी कोई शक नहीं है कि, नारायणमूर्ति ने जो कहा है उसके पीछे उनका इतने सालों का अनुभव है. लेकिन बड़ा सवाल ये भी है कि क्या वास्तव में ये तब संभव है जब हर साल अप्रेजल के नाम पर कंपनियां अपने कर्मचारियों को उतनी ही हाइक देती हैं जितना दाल में नमक होता है.

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