
भारत या चीन? एशिया में कंडोम इस्तेमाल में कौन है नंबर वन, किस देश में सबसे ज्यादा डिमांड
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एशिया का कंडोम मार्केट आने वाले दशक में बड़ी छलांग लगाने को तैयार है. इंडेक्स बॉक्स की ताज़ा रिपोर्ट के मुताबिक, 2035 तक इस मार्केट का आकार 19 अरब यूनिट्स और 405 मिलियन डॉलर तक पहुंच सकता है.
मेडिकल स्टोर में आपने अक्सर देखा होगा कि कंडोम का पैकेट दुकान की ऐसी जगह पर रखा होता है, जहां वह आसानी से दिख जाए. वजह साफ है-'कंडोम'. ये शब्द बोलने में लोग आज भी हिचकिचाते हैं. समाज में अक्सर यह शब्द खुलकर नहीं लिया जाता. दुकानदार भी इस मनोविज्ञान को समझते हैं और इसलिए पैकेट को सामने रखते हैं ताकि लोगों को खरीदने में कम परेशानी हो.
लेकिन यह वही कंडोम है, जिसका नाम लेने में लोग झिझकते हैं, और जिसका कारोबार आज दुनिया भर में अरबों का है. एशिया में तो इसका मार्केट लगातार बढ़ रहा है. आंकड़ों पर जाने से पहले ज़रूरी है कि कंडोम के इतिहास पर एक नजर डाली जाए.
कंडोम का इतिहास
कंडोम का जिक्र हजारों साल पुराना है. माना जाता है कि करीब 5000 साल पहले यहूदी पौराणिक कथाओं में राजा मिनोस की कहानी में बकरी के मूत्राशय का इस्तेमाल सुरक्षा के तौर पर किया गया था. प्राचीन मिस्र में भी लोग प्रोटेक्शन का इस्तेमाल करते थे, जबकि प्राचीन रोम में बकरियों और भेड़ों के मूत्राशय और आंतों से बने कंडोम काफी प्रचलित थे.
1920 में आई क्रांति
हालांकि असली बदलाव 1920 में लेटेक्स की खोज के साथ आया. इसके बाद कंडोम आसानी से बनने लगे, ज़्यादा टिकाऊ और सुरक्षित हो गए. यही वजह है कि आज कंडोम दुनिया का सबसे सुलभ और भरोसेमंद गर्भनिरोधक साधन माना जाता है. यह न सिर्फ यौन संचारित रोगों से बचाता है, बल्कि जनसंख्या नियंत्रण में मदद करता है और महिलाओं को आजादी देता है.

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