
बिहार: सुशील मोदी को साइडलाइन करना बीजेपी को पड़ा भारी? 2017 में ऐसे धराशायी किया था महागठबंधन
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नीतीश कुमार ने बीजेपी का दामन छोड़ फिर एक बार महागठबंधन के साथ मिलकर बिहार में नई सरकार बना ली है. इस पूरी कवायद में जिस एक व्यक्ति की सबसे ज्यादा चर्चा हो रही है, वो है कभी बिहार बीजेपी का चेहरा रहे-सुशील कुमार मोदी की. साल 2017 में वो सुशील कुमार मोदी ही थे, जिन्होंने लालू प्रसाद यादव के खिलाफ मोर्चा बंदी की, महागठबंधन को धराशायी किया था, नीतीश को खींचकर एनडीए में लाए और बीजेपी को राज्य की सत्ता में कायम किया...
बिहार की राजनीति में सुशील कुमार मोदी, वो नाम है जिसे सिर्फ बीजेपी का चेहरा ही नहीं, बल्कि सत्ता का सूत्रधार भी माना जाता है. सुशील कुमार मोदी की पहचान ऐसे नेता की रही है, जो अपने विरोधियों के खिलाफ पूरा शोध करते हैं और फिर तथ्यों के साथ अक्रामक रणनीति अपनाकर हमला करते हैं. साल 2017 के अप्रैल महीने में उन्होंने आरजेडी और लालू प्रसाद यादव के परिवार को जब हमला करना शुरू किया, तो परिणा में महागठबंधन धराशायी हो गया. नीतीश कुमार एक बार फिर एनडीए में शामिल हुए और बीजेपी को सत्ता सुख मिला. अब जब नीतीश कुमार एक बार फिर पाला बदलकर महागठबंधन के साथ हो गए हैं, तो बिहार में इस बात की चर्चा हो रही है कि क्या बिहार में सुशील कुमार मोदी को साइडलाइन करना बीजेपी को भारी पड़ गया. वैसे भी बिहार की राजनीति में सुशील मोदी के हाशिये पर जाने की चर्चा विरोधियों ने कई बार की. उनकी पार्टी के लोगों ने उन्हें हाशिए पर भेजा भी. लेकिन अगर उनके कद की बात की जाए, तो ये देखने वाली बात है कि बिहार से निकलते ही कितना बड़ा परिवर्तन हो गया. इस बात का प्रमाण नीतीश का ये कहना है कि सुशील मोदी होते, तो बात अलग होती.
धराशायी किया था महागठबंधन
साल 2017 का वो वक्त आपको याद है, जब लालू प्रसाद यादव के परिवार पर आरोपों की बौछार होने लगी. उस वक्त नीतीश कुमार महागठबंधन में शामिल थे. सुशील मोदी ने सोशल मीडिया का इस्तेमाल किया. लालू परिवार की बेनामी संपत्ति के खुलासे के मामले में उन्होंने प्रेस कांफ्रेंस की झड़ी लगा दी. उन दिनों में पार्टी विरोधियों के निशाने पर रहने वाले मोदी की इस काबिलियत को पार्टी के केन्द्रीय नेतृत्व को भी मानना पड़ा. सुशील मोदी की वजह से नीतीश कुमार महागठबंधन से अलग हुए, लेकिन जब उन्हीं को नीतीश के साथ डिप्टी सीएम नहीं रहने दिया गया, तो उसका परिणाम सत्ता गंवाने के रूप में आया.
सुशील मोदी की 4 अप्रैल 2017 की प्रेस कॉन्फ्रेंस कौन भूल सकता है भला, लालू परिवार तो कतई नहीं. तब मॉल की मिट्टी को अवैध तरीके से पटना जू को बेचने का सबसे पहला मामला उजागर हुआ. फिर क्या था, सुशील मोदी ने इस मामले को लपका और दूसरे ही दिन मिट्टी घोटाले का आरोप लगाते हुए सबूत के साथ प्रेस कांफ्रेंस कर दी. मामले की जांच होने लगी, तब तक सुशील मोदी के पास अन्य स्रोतों से लालू परिवार की बेनामी संपत्ति का और विवरण हाथ लग गया. सुशील मोदी ने अपने हमले जारी रखे. इसके बाद 11 अप्रैल को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में सुशील मोदी ने कहा- यह तो शुरुआत है, खुलासे अभी और बाकी हैं.
लालू परिवार के सदस्यों पर लगाए आरोप
05 मई 2017 की प्रेस कांफ्रेंस में सुशील मोदी ने लालू के बड़े बेटे तेज प्रताप यादव पर आरोप लगाया कि उसने गलत तरीके से पेट्रोल पंप का आवंटन लिया है. इसके बाद एजेंसिया सक्रिय हो गयीं और कानूनी कार्रवाई होने लगी. सुशील मोदी यहीं नहीं रुके और लगातार मीडिया के माध्यम से लालू पर हमला बोलते रहे. उन्होंने 20 जून की प्रेस कांफ्रेंस में कहा कि लालू की पत्नी राबड़ी देवी 18 फ्लैटों की मालकिन हैं. 04 जुलाई को कहा कि लालू के बड़े बेटे तेज प्रताप को महज तीन साल की उम्र में सेवा के बदले 13 एकड़ जमीन दान में मिली. 06 जुलाई को उन्होंने राजद नेता कांति सिंह, रघुनाथ झा और बाकी लोगों से दान में मिली जमीन का खुलासा किया.

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