
बेघर…युवा…औरत: 'सोते हुए लोग चिपट जाते, दुत्कारो तो मारपीट करते, कभी घर-परिवार वाली थी, वक्त ने सब छीन लिया'
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दिल्ली-एनसीआर का मौसम अब भी सर्द बना हुआ है. धूप की चमक बीते इश्क की कसक जितनी चुभन-भरी. परतदार कपड़ों के बीच भी हवा किसी घुसपैठिए के अंदाज में भीतर चली आती है. इसी शहर का एक और चेहरा भी है. फ्लाईओवरों की आड़ में सोता. सड़क किनारे छिपता. इनमें औरतें भी मिलेंगी. अधपेट...अधढंकी...अधसोई...और अधजिंदा!
सर्दियों में दिल्ली दो फांक हो जाती है. एक हिस्सा वो है, जिसके लिए ठंड कश्मीरी फिरन और पश्मीना की नुमाइश का वक्त है. घरों में हीटर और मलमली रजाइयों के बीच पॉल्यूशन पर बहसें चलेंगी. दूसरा हिस्सा ठीक उलट है. बेघर. तिस पर भी औरत. इनकी जद्दोजहद खुद को धुएं नहीं, रेप से बचाना है. वे ठंड में महंगे कपड़े पहन इतराती नहीं, खुद को ढांप-भर पाने की जुगत में रहती हैं. सर्दियों में उन्हें हेल्दी सूप की हुड़क नहीं लगती, भरपेट खाना उनका अकेला हासिल है. फ्लाईओवर-सड़क और मंदिर-दरगाहों किनारे सोती इन्हीं औरतों से aajtak.in ने बात की. कुमुदा (पहचान छिपाई हुई) ऐसा ही एक चेहरा हैं.
वे कहती हैं- पहले मैं भी घरबार वाली थी. मौसम बदलने पर अचार-पापड़ सुखाती तो उन्हें बंदरों-कौओं से बचाते झुंझलाती. वक्त पलटा. अब हर रात खुद को साबुत बचा पाना बड़ी चीज है.
सराय काले खां! शहर के दक्षिण-पूर्वी इस हिस्से से शहर-ए-दिल्ली के लोग अक्सर गुजरते हैं. यहां निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन से लेकर मेट्रो की पिंक लाइन भी है. मुगल दौर में सराय काले ख़ां एक पड़ाव हुआ करता था, जहां से बादशाहों से काफिले गुजरते और दूर-दराज के मुसाफिर पनाह लेते थे.
सल्तनत बीत गई, लेकिन तासीर वही रही. साल 2024 में इस जगह का नाम बदलकर आदिवासी नेता के नाम पर बिरसा मुंडा चौक कर दिया गया. सराय काले खां अब भी सैकड़ों के लिए ठिकाना है. फर्क यही है कि मुसाफिरों की जगह अब बेघर ले चुके, जिनके लिए सड़कें ही सराय हैं. मिलने पर ये लोग मुस्कुराते हुए बात करते हैं. तस्वीर भी खिंचाते हैं. बस घर के भीतर बुलाकर बैठने की मनुहार नहीं कर पाते. ठंडी-नंगी सड़कों पर उम्र का बड़ा हिस्सा बिता चुकी कुमुदा भी इनमें से एक हैं. महोबा की इस महिला ने दिल्ली के शुरुआती दिन सड़क पर बिताए.
बेघरों के लिए आश्रय गृह! दरवाजे पर 'कुमुदा सदन' या 'कुमुदिनी' जैसा कोई फैंसी नेमप्लेट नहीं, बल्कि धूसर-सफेद बोर्ड पर आश्रय गृह लिखा हुआ.

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