
नर की जगह कैसे होने लगी नारियल की बलि... पूजा-पाठ में क्या है इस फल का महत्व
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नारियल हिंदू पूजा-पाठ का अनिवार्य हिस्सा है, जिसका धार्मिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक महत्व गहरा है. यह फल न केवल धार्मिक अनुष्ठानों में उपयोग होता है, बल्कि इसके पीछे कई पौराणिक कथाएं और लोककथाएं भी जुड़ी हैं.
सनातनी और हिंदू सभ्यता में पूजा-पाठ की बात होती है तो एक फल की मौजूदगी बड़ा ही प्रभाव डालती है. ईश्वर को अर्पित करना हो, हवन की पूर्णाहुति देनी हो या किसी मंदिर का प्रसाद हो. नारियल ऐसा फल है जो अनायास ही पूजा-पाठ जैसी पवित्र गतिविधियों का पर्याय बन जाता है. नारियल का वृक्ष जितनी ऊंचाई लिए दिखता है, इसके इतिहास और महत्व की जड़ें उससे कहीं अधिक गहराई तक ले जाती हैं.
मलेशिया, दक्षिण-पूर्व एशिया (भारत सहित), इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया, न्यू गिनी तथा अनेक प्रशांत द्वीप-समूह ऐसे हैं जहां तक नारियल का साम्राज्य फैला हुआ है और यह सभी देश नारियल के मूल निवास वाले इलाके माने जाते हैं. इस वृक्ष का जिक्र पुरातात्विक खुदाइयों की गहराइयों से लेकर शिलालेखों की न पढ़ी जा सकने वाली लिपियों तक में है. संस्कृत ग्रंथों में यह धार्मिक भी है, कृषि और आयुर्वेदिक रूपों में भी है और ऐतिहासिक अभिलेखों को देखेंगे तो चीन, अरब और इटली के यात्रियों तक यात्रा-वृत्तांतों में इसके किस्से भरे पड़े हैं.
नारियल का इतिहास नारियल का पहला संदर्भ 1030 ईस्वी में अल-बरुनी के लेखों में नजर आता है. वहीं इब्न बतूता (1333) अपनी यात्रा-कथा में दर्ज करते हैं कि 'यह अमृत-तुल्य फल शहद उत्पन्न करता है, जिसे भारत, यमन एवं चीन के व्यापारी लालच से खरीदते हैं और अपने देशों में ले जाकर इससे स्वादिष्ट मिठाइयां बनाते हैं.'
साहसी नाविक यात्राओं के लिए मशहूर वेनिस के मार्को पोलो (1254-1324 ईस्वी) पर नारियल का ऐसा गहरा असर था कि, सुमात्रा, भारत और निकोबार द्वीपों में इसे पाकर उसने इसे “फिरौन का नट” कह दिया था. मिस्र के प्राचीन शासकों के लिए भी यह पसंदीदा फल रहा है.
भारत की पावन भूमि में इसे ‘कल्पवृक्ष’ जैसा कहा गया है. हालांकि कल्पवृक्ष होने का दावा हारसिंगार का भी है. कल्पवृक्ष वह पौराणिक वृक्ष है जो हर मनोकामना को साकार कर देता है. संस्कृत साहित्य की अमूल्य रचनाओं में इस नारियल की चमत्कारिक शक्तियों का विस्तार से वर्णन है. यह स्वास्थ्य, धन वर्षा, संतान प्राप्ति का आशीष और समृद्धि देने वाला फल भी माना जाता है. कहते हैं कि यह समुद्र-मंथन से निकला फल है.
ऋषि विश्वामित्र की कथा से जुड़ा है नारियल भारतीय पौराणिक कथाओं में इसकी उत्पत्ति का श्रेय ऋषि विश्वामित्र को दिया गया है. उन्होंने अपने मित्र राजा त्रिशंकु को इस पेड़ के जरिए सहारा दिया. क्योंकि इंद्र ने जबरन स्वर्ग भेजे जा रहे त्रिशंकु को अपने बल से धकेल दिया था. तब विश्वामित्र ने उन्हें सहारे के लिए जिस ऊंचे ताड़ का प्रयोग किया वही आगे चलकर नारियल का पेड़ बन गया. त्रिशंकु का मस्तक ही इसका फल है, उनकी दाढ़ी और बालों से नारियल की जटा बनी और इस तरह एक मनुष्य का मुख एक फल बन गया.

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