
ठाकरे परिवार से कैसे छिन गया 'शिवसेना नाम' और 'सिंबल'? उद्धव को क्या नुकसान, शिंदे को कितना फायदा होगा?
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महाराष्ट्र की सियासत में बड़ा उलटफेर हो गया है. चुनाव आयोग ने एकनाथ शिंदे के गुट को ही 'असली शिवसेना' माना है. आयोग ने शिवसेना का नाम और पार्टी सिंबल धनुष-बाण एकनाथ शिंदे को दे दिया है. इसे उद्धव ठाकरे के लिए बड़ा झटका और एकनाथ शिंदे के लिए बड़ी जीत माना जा रहा है. ऐसे में जानना जरूरी है कि ठाकरे परिवार के हाथ से शिवसेना कैसे निकल गई? अब आगे क्या होगा?
महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे का धड़ा ही 'असली शिवसेना' है. चुनाव आयोग ने 'शिवसेना' का नाम और 'सिंबल' एकनाथ शिंदे को दे दिया है. शुक्रवार को 78 पन्नों के फैसले में चुनाव आयोग ने पार्टी का नाम 'शिवसेना' और सिंबल 'धनुष और बाण' एकनाथ शिंदे गुट को दे दिया. आयोग ने ये भी बताया कि पिछले साल अक्टूबर में शिंदे गुट को जो पार्टी का नाम 'बालासाहेबांची शिव सेना' और सिंबल 'दो तलवार और एक ढाल' दिया था, उसे अब फ्रीज कर दिया जाएगा.
हालांकि, उद्धव ठाकरे ने इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती जरूरी दी है. लेकिन चुनाव आयोग का ये फैसला एक ओर जहां उद्धव ठाकरे और उनके समर्थकों के लिए बड़ा झटका है तो दूसरी ओर शिंदे गुट के लिए ये बड़ी जीत है. उद्धव ठाकरे ने चुनाव आयोग के इस फैसले को 'लोकतंत्र की हत्या' करने जैसा बताया है. वहीं, मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने इसे 'सच्चाई की जीत' कहा है.
पिछले साल जून में एकनाथ शिंदे ने उद्धव ठाकरे से बगावत कर दी थी. शिंदे शिवसेना के 55 में से 40 विधायकों को अपने साथ ले गए थे और बीजेपी के साथ मिलकर सरकार बना ली थी. इस सरकार में एकनाथ शिंदे मुख्यमंत्री बने और बीजेपी के देवेंद्र फडणवीस डिप्टी सीएम. महाराष्ट्र में हुए इस सियासी बदलाव के बाद से ही उद्धव ठाकरे और एकनाथ शिंदे के बीच 'असली शिवसेना' की लड़ाई चल रही थी.
शिंदे ही क्यों 'असली' शिवसेना?
- अपने फैसले में चुनाव आयोग ने बताया है कि शिंदे गुट को ही 'असली शिवसेना' क्यों माना गया है? चुनाव आयोग ने बताया कि एकनाथ शिंदे के पास 55 में से 40 विधायकों और लोकसभा के 18 में से 13 सांसदों का समर्थन है.
- अपने आदेश में चुनाव आयोग ने बताया, शिंदे के समर्थन में जो 40 विधायक हैं, उन्हें 2019 के विधानसभा चुनाव में 36.57 लाख यानी 76 फीसदी वोट मिले थे. जबकि, ठाकरे गुट के पास जो 15 विधायक हैं, उन्हें 11.25 यानी लगभग 23.5 फीसदी वोट ही मिले थे.

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