
फडणवीस-शिंदे का 'माइक्रो मैनेजमेंट' पड़ा भारी, जानिए साथ आने के बावजूद भी मुंबई क्यों नहीं बचा पाए ठाकरे ब्रदर्स
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बीएमसी चुनाव में बीजेपी और एकनाथ शिंदे की शिवसेना ने मिलकर 114 का मैजिक फिगर पार कर लिया. 28 साल बाद ठाकरे परिवार सत्ता से बाहर हो गया. उद्धव और राज ठाकरे साथ आए, फिर भी मराठी वोटों को एकजुट नहीं कर सके. नतीजों ने दिखाया कि मुंबई की राजनीति और मराठी वोट समीकरण में बड़ा बदलाव आ चुका है.
महाराष्ट्र की राजनीति ने फिर एक बार करवट ली है और 28 साल बाद ठाकरे को सत्ता से परास्त कर दिया गया है. बीएमसी के चुनावों में बीजेपी ने शिंदे के साथ मिलकर बड़ी जीत हासिल की है. आंकड़े देखें तो बीजेपी को 89, शिंदे की शिवसेना को 29, ठाकरे की शिवसेना को 65 और मनसे को 6 सीटें मिली हैं.
227 वॉर्ड की बीएमसी में 114 का मैजिक फिगर है, जो महायुति ने पार किया है. लेकिन सवाल यह है कि क्या शिवसेना और मनसे साथ आकर भी अपना जादू नहीं दिखा सके? क्यों ठाकरे भाई मिलकर भी मुंबई की सत्ता नहीं बचा पाए?
मुंबई में मराठी वोटों का क्या समीकरण है?
मुंबई में 36 विधानसभा क्षेत्रों में मिलकर 1 करोड़ से ज्यादा वोटर्स हैं. जो 227 वॉर्ड हैं, उनमें माना जाता है कि 140 से ज्यादा वॉर्ड्स में मराठी वोटर्स निर्णायक हैं. 40 से ज्यादा ऐसे वॉर्ड हैं जिनमें परप्रांतीय या हिंदी भाषा बोलने वाले लोग अधिक हैं. 40 ऐसे भी वॉर्ड्स हैं जहां मुस्लिम और पिछड़े वर्ग के मतदाताओं की संख्या अधिक है.
लेकिन 2017 के चुनाव में बीजेपी ने 82 सीटें जीती थीं और ठाकरे ने 84 सीटों पर झंडा लहराया था. बीजेपी ने जो 82 सीटें जीती थीं, उनमें परप्रांतीय या फिर हिंदी भाषा बोलने वाली ज्यादातर सीटें शामिल थीं. और 40 से ज्यादा सीटें उन्होंने मराठी भाषा बोलने वालों के दबदबे वाले इलाकों से जीती थीं. यानी ठाकरे का गढ़ पहले से ही, यानी 2017 में ही बीजेपी ने तोड़ दिया था.
पार्टी टूटने से उद्धव को कितना नुकसान?

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