
जब नेपाल के शाही परिवार में एक कार को लेकर छिड़ा विवाद, जानें हिटलर के उस तोहफे की कहानी
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जर्मन तानाशाह एडोल्फ हिटलर गोरखा आर्मी की ताकत को बखूबी जानता था. दूसरे विश्व युद्ध के दौरान उसकी मंशा थी कि, गोरखा आर्मी किसी भी कीमत पर अंग्रेजों का साथ न दे. अपने इसी चाहत के चलते उसने डेमलर-बेंज की इस कार को बर्लिन से 6,000 किलोमीटर दूर काठमांडू भेजी थी.
Nepal Gen Z Protest: हिमालय की तलहटी में बसा पड़ोसी मुल्क नेपाल आज राजनीतिक अस्थिरता से जूझ रहा है. आज़ादी मिली तो हमें लोकतंत्र मिला, लेकिन नेपाल ने उस रास्ते पर देर से कदम रखा. और अब? काठमांडू, पोखरा, वीरगंज जैसी गलियों में आग लगी है. वजह... सोशल मीडिया बैन. फेसबुक, इंस्टा, टिकटॉक बंद. उसके बाद Gen-Z की उग्र भीड़ सड़कों पर उतरी. हाथ में स्लोगन वाले बैनर, डंडे और चेहरे पर गुस्सा. मांग साफ़ थी, आवाज़ दबाओगे तो हम और ज़ोर से चिल्लाएँगे. सोशल मीडिया पर बैन के बाद हो रहे हिंसक प्रदर्शनों और Gen-Z की क्रांति अब काठमांडू, पोखरा, वीरगंज जैसे शहरों को अपने ज़द में ले चुकी है.
लेकिन ऐसा पहली बार नहीं है कि काठमांडू की घाटियाँ सत्ता, राजशाही और लोकतंत्र की टकराहट की गूंज सुन रही हों. इससे पहले भी ऐसा कई बार हुआ है, जब नेपाल की सत्ता पर आसीन हुक्मरानों को जनता की बगावत झेलनी पड़ी है. कई बार तो विवाद शाही परिवार की अंतर्कलह के चलते भी उपजा है. इतिहास की उसी धुंध में हमें मिलता है एक किस्सा. साल था 2008. जब नेपाल के शाही परिवार में तोहफे में मिली एक कार को लेकर विवाद खड़ा हो गया. यह कोई साधारण कार नहीं थी, बल्कि जर्मन तानाशाह एडोल्फ हिटलर की भेंट की गई एक ऑलिव-ग्रीन मर्सिडीज़ बेंज कार थी. तो आइये जानें क्या था पूरा मामला-
नेपाल के शाही परिवार में इस कार को लेकर उठे विवाद को जानने से पहले यह समझ लेते हैं कि, जर्मनी में बनी यह कार हजारों किलोमीटर दूर नेपाल कैसे पहुंची. दरअसल, द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान जब यूरोप आग की लपटों में जल रहा था, तब हिटलर ने अपने विदेशी संबंधों को मजबूत करने के लिए कुछ मित्र राष्ट्रों और प्रभावशाली शासकों को भेंट स्वरूप तोहफे भेजे थे.
इन्हीं में से एक थे नेपाल के तत्कालीन महाराजा 'त्रिभुवन वीर विक्रम शाह देव' (नेपाल के आखिरी राजा ज्ञानेंद्र के दादा). जिनके लिए हिटलर ने 1938 मॉडल डेमलर-बेंज की यह अनोखी कार भेजी थी. हिमालय की तलहटी में बसा नेपाल उस समय सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण राज्य माना जाता था. जो जर्मनी के लिए एशियाई राजनीति में एक अहम कड़ी था. लेकिन यह इस तोहफे के पीछे हिटलर की एक मंशा छिपी थी.
गोरखा फौज अपनी बहादुरी, वफादारी और युद्ध में निडरता के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध थीं. हिटलर भी गोरखा फौज की ताकत और बहादुरी का कायल था. एडॉल्फ हिटलर ने एक बार कहा था कि अगर उसके पास गोरखा सैनिक होते, तो दुनिया की कोई भी सेना उसे हरा नहीं पाती. गोरखा की इसी ताकत को देखते हुए हिटलर ने नेपाल के राजा को यह कार तोहफे में दी थी. दरअसल, वो चाहता था कि, गोरखा आर्मी किसी भी कीमत पर अंग्रेजों का साथ न दे. अपनी इसी मंशा के चलते उसने डेमलर-बेंज की यह कार बर्लिन से 6,000 किलोमीटर दूर काठमांडू भेजा था.
कुछ जानकारों का मनना है कि, हिटलर द्वारा भेजी गई ये डेमलर-बेंज उस वक्त संभवत: नेपाल की पहली कार थी. उस दौर में पहाड़ियों से घिरे नेपाल में ऐसी सड़कें मौजूद नहीं थीं कि, उन पर कार चलाई जा सके. इसलिए इस कार को लकड़ी के बड़े-बड़े लट्ठे पर बांधकर मजदूरों द्वारा ढोया गया और पहाड़ के दुर्गम इलाकों से होते हुए इसे राजधानी काठमांडू तक पहुंचाया गया था.

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