
छत्तीसगढ़: सालभर के बच्चे को पेट से बांधकर ऑटो चलाती है मां, जिंदगी की लड़ाई यूं लड़ रही है तारा
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सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की एक बेहद खूबसूरत कविता है, वह तोड़ती पत्थर, देखा मैंने उसे इलाहाबाद के पथ पर, वह तोड़ती पत्थर. जी हां, यह सारे जतन इंसान अपना पेट भरने के लिए ही करता है. लगभग ऐसी ही एक तस्वीर छत्तीसगढ़ के अंबिकापुर की सड़कों में रोजाना देखने को मिलती है.
महाप्राण कविवर सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की एक कविता है, 'वह तोड़ती पत्थर, देखा मैंने उसे इलाहाबाद के पथ पर, वह तोड़ती पत्थर'. इस कविता के भावार्थ को चरितार्थ करती एक महिला इन दिनों छत्तीसगढ़ के अंबिकापुर शहर में सड़कों पर रोजाना देखने को मिलती है. तारा प्रजापति नाम की इस महिला के जज्बे के आगे मर्दों की हिम्मत भी जवाब दे गई. यह महिला अपनी गोद में अपने एक साल के बच्चे को अपने पेट के आगे बांध कर ऑटो रिक्शा चलाती है. महिला दिवस के दिन ऐसी कहानियां जीवन के लिए संघर्ष कर रहे हर व्यक्ति को प्रेरणा देती है. (फोटो- सुमित सिंह) खास बात यह है कि अगर इस शहर में किसी से भी तारा प्रजापति के बारे में पूछा जाए तो वह एक ही जवाब देगा कि वह बहुत ही जज्बे वाली महिला हैं. वह अपने बच्चे को गोद में लेकर पूरे शहर में ऑटो रिक्शा चलाने का काम करती हैं. यह काम बिल्कुल भी आसान नहीं है लेकिन बावजूद इसके उसे यह काम करना पड़ता है. ऐसे में वह अपने काम के दौरान अपने बच्चे का भी पूरा ध्यान रखती है. इसके लिए वह पानी की बोतल के साथ खाने का भी सामान साथ रखती है. कहते हैं कि जहां चाह है, वहां राह है और इंसान यदि चाह ले तो हर काम को किया जा सकता है.More Related News

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