
IIT कानपुर में PhD छात्र की आत्महत्या, 23 दिनों में दूसरा मामला... क्या 'प्रेशर' स्टूडेंट्स की जान ले रहा है?
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पढ़ाई के दबाव के अलावा बेरोजगारी भी आत्महत्या का एक बड़ा कारण रही है. NCRB के आंकड़ों के अनुसार, 2019 में बेरोजगारी से जुड़े आत्महत्या के 2,851 मामले दर्ज किए गए थे. 2020 में यह संख्या बढ़कर 3,548 हो गई, जो इस अवधि का सबसे ऊंचा आंकड़ा है. 2021 में भी लगभग इतने ही मामले (3,541) सामने आए.
20 जनवरी की दोपहर आईआईटी कानपुर में 25 सालीय पीएचडी स्कॉलर स्वरूप ईश्वरम ने आत्महत्या की. इस खबर ने एक बार फिर देश में छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य को लेकर चिंता बढ़ा दी है. जानकारी के अनुसार, उन्होंने परिसर के एक आवासीय भवन की छठी मंज़िल से कूदकर अपनी जान दे दी. बीते 23 दिनों में यह कैंपस में आत्महत्या का दूसरा मामला है. यह घटना ऐसे समय सामने आई है जब आधिकारिक आंकड़े दिखाते हैं कि भारत में छात्र आत्महत्याओं की संख्या साल दर साल बढ़ रही है, और पढ़ाई का दबाव व मानसिक तनाव एक गंभीर चुनौती बनते जा रहे हैं.
छात्र आत्महत्याओं के आंकड़े
नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (NCRB) के अनुसार, साल 2019 में 10,335 छात्रों ने आत्महत्या की थी. यह संख्या 2020 में बढ़कर 12,526 हो गई. 2021 में भी यह आंकड़ा 13,000 के पार रहा. हालांकि 2022 में इसमें हल्की गिरावट दर्ज की गई, लेकिन 2023 में छात्र आत्महत्याओं की संख्या बढ़कर 13,892 पहुंच गई, जो अब तक का सबसे बड़ा आंकड़ा है.
डेटा के मुताबिक, आत्महत्या के मामले 18 साल से कम उम्र के छात्रों में सबसे ज्यादा दर्ज किए गए. 2019 में इस आयु वर्ग में 1,577 मामले सामने आए थे. 2020 और 2021 में इनमें गिरावट आई, लेकिन 2022 और 2023 में फिर से बढ़ोतरी दर्ज हुई और 2023 में यह संख्या 1,303 तक पहुंच गई.
18 से 30 साल आयु वर्ग में भी इसी तरह का रुझान देखा गया. 2019 से 2021 के बीच मामलों में गिरावट आई, लेकिन 2022 और 2023 में फिर से बढ़ोतरी हुई. वहीं 30 से 45 साल आयु वर्ग में आत्महत्या के मामले तुलनात्मक रूप से काफी कम रहे.
अन्य कारण भी जिम्मेदार

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