
Taj Mahal... दो किताबें, दो धारणाएं और एक बड़ा विवाद!
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ताजमहल के इतिहास को लेकर एक बार फिर जंग छिड़ गई है. सबसे बड़ा सवाल तो ये उठ रहा है कि आखिर ये ताजमहल है या फिर तेजोमहालय? इतिहास के पन्ने खंगालने पर दो किताबें मिलती हैं जिनमें इस विवाद पर विस्तार से बात हुई है.
दुनिया का सातवां अजूबा...प्यार की निशानी और अद्भुत कलाकारी...लोगों के मन में ताजमहल की यही अमिट छाप बैठी हुई है. 1632 में मुगल शासक शाहजहां ने इसे बनवाना शुरू किया था. बचपन से किताबों में पढ़ा है कि जब शाहजहां की बेगम मुमताज का निधन हो गया, तब उन्हीं की याद में ये ताजमहल बना.
लेकिन अब जो बात किताबों में लिखी है, जो सभी को पढ़ाया गया है, उसे सीधी चुनौती दी जा रही है. कहा जा रहा है कि ताजमहल की जगह हजारों साल पहले वहां पर एक शिव मंदिर था. ऐसा भी दावा हुआ है कि ताजमहल का असल नाम तो 'तेजो महालय' है.
हाल ही में इस विवाद को फिर हवा देने का काम अयोध्या के बीजेपी मीडिया प्रभारी रजनीश सिंह ने किया था. जिन्होंने हाई कोर्ट में याचिका दायर कर कह दिया कि ताजमहल के बंद पड़े 22 कमरों की जांच होनी चाहिए.
पीएन ओक और उनके तेजो महालय वाले दावे
अब याचिका जरूर बीजेपी नेता ने डाली है, लेकिन उनकी थ्योरी को सपोर्ट करते हुए कई साल पहले एक किताब भी लिखी गई थी. उसी किताब ने सबसे पहले ये दावा किया था कि आगरा में ताजमहल की जगह एक मंदिर हुआ करता था. लेखक थे पीएन ओक और उनकी किताब का नाम था 'Taj Mahal: The True Story’. उस समय उस किताब को मराठी भाषा में लिखा गया था.
कहा जाता है कि सबसे पहले ताजमहल को लेकर मंदिर वाला दावा पीएन ओक ने ही अपनी किताब से किया था. उन्होंने अपनी किताब में कहा था कि ताजमहल वास्तव में तेजोमहालय है जिसका निर्माण 1155 में किया गया था. उनके मुताबिक तब वहां पर एक शिव मंदिर हुआ करता था. ओक के कथन के अनुसार मुगलों के भारत आने से पहले ही आगरा में एक भव्य स्मारक मौजूद था.

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