
ठाकरे ब्रांड की दुर्गति, आत्मघाती साबित हुआ 'हिंदुत्व' से समझौता
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बीएमसी चुनावो और महाराष्ट्र नगर निगम चुनावों में ठाकरे बंधुओं की हुई दुर्गति ने स्पष्ट कर दिया है कि बाला साहब की विरासत अब परिवार के हाथ से छिटक चुकी है. मुंबई का शिवसैनिक बाला साहब में छत्रपति शिवाजी को देखता था. बीएमसी चुनावों में उद्धव और राज दोनों में ही बाला साहब की दृष्टि और चतुराई दोनों ही नजर नहीं आई.
दिवंगत बाल ठाकरे ने जिस मेहनत से महाराष्ट्र में मराठी-मानुष जैसा एक कट्टर और निष्ठावान वोटबैंक तैयार किया था, शुक्रवार को आए महाराष्ट्र नगर निगम चुनाव नतीजों में देश ने उस वोट बैंक का ठाकरे ब्रांड से मोहभंग होते देखा. BMC के कुछ वार्डों में उद्धव की शिवसेना को दिल रखने वाली मामूली जीत तो मिली. लेकिन, बाकी पूरे प्रदेश में उसका सूपड़ा साफ हो गया. ठाकरे ब्रांड की इस बर्बादी में उद्धव और राज दोनों ने बराबर का योगदान दिया.
बाला साहब ठाकरे की विरासत कम से एक पुश्त और तो चल ही सकता थी. पर अपनी बर्बादी का जिम्मेदार ठाकरे परिवार खुद है. यह पतन अचानक नहीं हुआ, बल्कि पिछले 3 वर्षों में उठाए गए गलत सियासी कदमों का नतीजा है.
बालासाहेब ठाकरे की विरासत संगठन, सड़क की राजनीति और कार्यकर्ता-केंद्रित नेतृत्व पर टिकी थी. लेकिन उनके बाद शिवसेना धीरे-धीरे परिवार-केंद्रित और फिर व्यक्ति केंद्रित पार्टी बनती चली गई. उद्धव ठाकरे ने संगठन को चलाने के बजाय उसे नियंत्रित करने की कोशिश की. पुत्र आदित्य ठाकरे के रूप में तीसरी पीढ़ी को संवारने में लग गए. सत्ता का मद ऐसा चढ़ा कि बीजेपी जैसी सहयोगी पार्टी प्रतिद्वंद्वी नजर आने लगी. आखिर में बाल ठाकरे का बनाया भाजपा से गठबंधन टूटा. और साथ ही हिंदुत्व के एजेंडे को तिलांजलि दे दी गई.
उद्धव जिस राह पर चल रहे थे, पार्टी पीछे छूट गई. संगठन में संवाद की जगह आदेश ले रहे थे. आखिर में वो असहमति पनपी, जिसे वे गद्दारी कहते रहे हैं. कांग्रेस और एनसीपी के साथ उद्धव का गठबंधन केवल राजनीतिक मजबूरी नहीं था, बल्कि यह कुर्सी के मोह के लिए शिवसेना की वैचारिक आत्मा से समझौता था. जाहिर है कि जब आत्मा ही साथ न हो कोई भी सफलता ज्यादा देर तक नहीं टिकती है. मुंबई का शिवसैनिक बाला साहब में छत्रपति शिवाजी को देखता था. मुस्लिम तुष्टिकरण के चलते कांग्रेस-विरोधी रहा वो खुद को ठगा हुआ महसूस करने लगा. ठाकरे परिवार ने इसे समय रहते या तो समझा नहीं, या फिर वे खुद को खुदा मान बैठे.
बाल ठाकरे ने 1966 में शिवसेना की स्थापना की. मराठी अस्मिता और रोजगार की लड़ाई के साथ हिंदुत्व का अनोखा मिश्रण करके 'मराठी मानुष' तैयार किया. शुरू में मुंबई में दक्षिण भारतीयों और उत्तर भारतीयों के खिलाफ सन ऑफ स्वायल का नारा दिया, जो नकारात्मक राजनीति का सबसे बड़ा उदाहरण था. पर मराठी युवाओं को इस नारे ने एकजुट किया. उन्हें सीधे सत्ता नहीं मिली, लेकिन वे सत्ता के बड़े खिलाड़ी बन चुके थे. बड़ी चतुराई से बाला साहब ने 1980-90 के दशक में राम मंदिर आंदोलन और बाबरी विध्वंस के बाद हिंदुत्व को मजबूती से अपना लिया. 'हिंदू हूं, हिंदू रहूंगा' का नारा देकर बहुत जल्दी ही वह हिंदू हृदय सम्राट बन गए. बीजेपी नेताओं और कार्यकर्ताओं के बीच भी.
इसी मिश्रण ने शिवसेना और ठाकरे ब्रांड को मुंबई ही नहीं, पूरे महाराष्ट्र में मजबूत बनाया. मराठी गौरव के साथ हिंदू राष्ट्रवाद का संयोजन ठाकरे परिवार की राजनीतिक पहचान बन गया. मातोश्री सिर्फ एक मकान का नाम नहीं था, वो फायर ब्रांड हिंदुत्व का हेडक्वार्टर था. जिसमें सिर्फ वैचारिक ही नहीं, महाराष्ट्र और देश की सत्ता के ताने-बाने तय होते. दुनिया का सबसे मशहूर सितारा माइकल जैक्सन भारत आया तो सबसे पहले मत्था ठेकने मुंबई में मातोश्री ही पहुंचा. ठाकरे ब्रांड में भावनात्मकता और आक्रामकता दोनों थी. जिसने लाखों शिव सैनिकों में जोश भरा.

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