
'MSP की गारंटी' वाले आंदोलन से क्यों दूर हैं साउथ इंडिया के किसान संगठन? समझिए
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Farmers Protest: एमएसपी की लीगल गारंटी समेत कई मांगों को लेकर किसान फिर से सड़कों पर उतर आए हैं. इसमें ज्यादातर पंजाब और हरियाणा के किसान शामिल हैं. दावे किए जाते हैं कि इन आंदोलनों से दक्षिण भारत के किसान दूरी रखते हैं, लेकिन क्या ऐसा सच में है? और इसकी वजह क्या है?
Farmers Protest: राजधानी दिल्ली से सैकड़ों किलोमीटर दूर पंजाब और हरियाणा में किसान प्रदर्शन कर रहे हैं. किसान दिल्ली पहुंचने की कोशिश कर रहे हैं, तो पुलिस और सुरक्षाबलों ने भी उन्हें रोकने की पूरी तैयारी कर रखी है.
फिलहाल, किसानों ने अपने 'दिल्ली चलो मार्च' को दो दिन के लिए टाल दिया है. ये फैसला खनौरी बॉर्डर पर एक युवक की मौत के बाद लिया गया है.
प्रदर्शन कर रहे किसानों की कई सारी मांगें हैं. इनमें सबसे बड़ी मांग एमएसपी पर कानूनी गारंटी की है. एमएसपी यानी न्यूनतम समर्थन मूल्य किसी फसल की कम से कम कीमत होती है. सरकार एमएसपी पर किसानों से फसल खरीदती है.
किसान संगठनों का दावा है कि सरकार ने उनसे एमएसपी की गारंटी पर कानून लाने का वादा किया था. लेकिन अब तक ऐसा हुआ नहीं है.
मौजूदा प्रदर्शन किसानों के दो संगठन- संयुक्त किसान मोर्चा (गैर-राजनैतिक) और किसान मजदूर मोर्चा की अगुवाई में हो रहा है. ये पंजाब और हरियाणा के हैं. इस आंदोलन को राकेश टिकैत के संगठन भारतीय किसान यूनियन का साथ भी मिल सकता है. ये पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों का संगठन है.
इससे पहले तीन कृषि कानूनों के खिलाफ जो आंदोलन हुआ था, उसमें भी मुख्य रूप से पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश के किसानों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया था. केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दायर कर दावा किया था कि दक्षिण भारत के किसान कृषि कानूनों के साथ हैं और वो इस आंदोलन में शामिल नहीं हैं. हालांकि, उस वक्त ऐसी कई खबरें आई थीं, जिसमें सामने आया था कि दक्षिण भारत के किसान भी तीन कृषि कानूनों के खिलाफ हुए आंदोलन में शामिल हुए थे.

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