
BMC चुनाव में 'ठाकरे ब्रदर्स' की दुर्गति की वजह क्या रही, अब भाइयों के सामने हैं 5 सवाल
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बीएमसी चुनाव ने महाराष्ट्र की सियासत में बड़ा उलटफेर कर दिया है. 25 साल बाद शिवसेना का किला ढह गया और पहली बार बीएमसी में बीजेपी का मेयर बनना लगभग तय है. ठाकरे ब्रदर्स की एकजुटता भी मतदाताओं को नहीं रिझा सकी. नतीजों ने बाला साहेब की विरासत और ठाकरे राजनीति के भविष्य पर गहरे सवाल खड़े कर दिए हैं.
देश ही नहीं पूरे एशिया की सबसे अमीर और बड़ी महानगरपालिका बीएमसी में पहली बार बीजेपी का मेयर बनने जा रहा है. सिर्फ बीएमसी ही नहीं महायुति ने महाराष्ट्र के 29 नगर निगमों में 25 निगमों में भगवा परचम लहराकर ठाकरे बंधुओं के साथ पूरे विपक्ष को हराया है.
अब सवाल ये कि बाला साहेब की विरासत का क्या होगा. राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे की पॉलिटिक्स का क्या होगा. बीएमसी चुनाव के नतीजों के मायने समझने की कोशिश करते हैं.
बीएमसी चुनाव के नतीजों की बड़ी बात ये है कि 25 साल बाद बीएमसी में शिवसेना का किला ढहा है.
अब आगे सवाल बाला साहेब की विरासत का है. सवाल बीएमसी में राज करने वाली शिवसेना के अस्तित्व का है, क्योंकि जिस अस्तित्व को बचाने के लिए 20 साल बाद ठाकरे बंधुओं ने हाथ मिला उस सियासत को महाराष्ट्र की जनता ने सिरे से नकार दिया. मुंबई से उद्धव की शिवसेना की 25 साल बाद विदाई हुई तो वहीं राज ठाकरे दहाई के आंकड़े के लिए तरसते नजर आए.
नतीजों से साफ है कि राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे की जोड़ी को मुंबई की जनता ने नकार दिया. कट्टर मराठा पॉलिटिक्स महाराष्ट्र की जनता को समझ नहीं आई. उत्तर भारतीयों के खिलाफ हिंसा का साइड इफेक्ट भी दिखा. इतना ही नहीं, ठाकरे ब्रदर्स गैर मराठा वोटरों को साथ लाने में नाकाम हुए. वहीं मुस्लिम वोटर ने इस गठबंधन से पूरी तरह से किनारा कर लिया.
जिस मातोश्री में पिछले 25 सालों से चुनाव के नतीजों पर जश्न मनता था शुक्रवार को वहां सन्नाटा पसरा हुआ था. अब इन नतीजों के बाद कई सवाल खड़े हो रहे हैं. जैसे-

बीएमसी चुनावो और महाराष्ट्र नगर निगम चुनावों में ठाकरे बंधुओं की हुई दुर्गति ने स्पष्ट कर दिया है कि बाला साहब की विरासत अब परिवार के हाथ से छिटक चुकी है. मुंबई का शिवसैनिक बाला साहब में छत्रपति शिवाजी को देखता था. बीएमसी चुनावों में उद्धव और राज दोनों में ही बाला साहब की दृष्टि और चतुराई दोनों ही नजर नहीं आई.

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