
राजनीतिक परिवारों के लिए सबक है ठाकरे ब्रदर्स और पवार परिवार की हार
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महाराष्ट्र के निकाय चुनाव नतीजों ने राज्य की राजनीति की तस्वीर बदल दी है. बीएमसी समेत 29 नगर निगमों में बीजेपी–शिंदे गठबंधन की बड़ी जीत हुई, जबकि ठाकरे ब्रदर्स और पवार परिवार बुरी तरह पिछड़ गए. यह परिणाम भावनात्मक और परिवारवादी राजनीति पर जनता की नाराजगी का संकेत देता है.
महाराष्ट्र में बीएमसी सहित 29 नगर निगम चुनावों में बीजेपी गठबंधन ने शानदार प्रदर्शन करते हुए कई प्रमुख शहरों में जीत हासिल की है. यह जीत एकनाथ शिंदे और बीजेपी गठबंधन की रणनीति का नतीजा है, जबकि ठाकरे ब्रदर्स के एक साथ आने के बावजूद शिवसेना (यूबीटी) अपना आखिरी किला नहीं बचा सकी. पुणे में भी बीजेपी विजयी रही, जहां उसने शरद पवार और अजित पवार की जोड़ी को सियासी मात दी है.
निकाय चुनाव के नतीजों ने महाराष्ट्र की राजनीति की दशा और दिशा पूरी तरह बदल दी है. बीएमसी में बीजेपी और शिंदे की महायुति ने बहुमत का जादुई आंकड़ा पार कर लिया है. पिछले तीन दशकों से बीएमसी की सत्ता पर काबिज ठाकरे परिवार का वर्चस्व अब खत्म हो गया है. उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे की जोड़ी भी बीजेपी लहर को रोकने में नाकाम रही.
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बीजेपी मुंबई में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है. सीएम देवेंद्र फड़णवीस की रणनीति ने विपक्षी गठबंधन के हर दांव को पूरी तरह फेल कर दिया है. पवार परिवार भी पस्त नजर आया. यह जीत न केवल मुंबई बल्कि पूरे महाराष्ट्र में बीजेपी के बढ़ते दबदबे का स्पष्ट संकेत है. मुंबई ही नहीं बल्कि महाराष्ट्र की 29 नगर निगम में से 23 में बीजेपी गठबंधन अपना कब्जा जमाने में कामयाब रही.
महाराष्ट्र में ठाकरे ब्रदर्स को जोड़ी पूरी तहह फेल
पिछले 30 सालों से बीएमसी पर शिवसेना का एकछत्र राज था, लेकिन इस बार मुंबईकरों ने बदलाव के पक्ष में वोट दिया है. हालांकि, 20 साल के बाद उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे आपसी गिला-शिकवा भुलाकर एक साथ नगर निगम चुनाव लड़ने का फैसला किया ताकि सियासी वर्चस्व को बचाए रखा जा सके. इसके बावजूद वे अपना गढ़ नहीं बचा पाए. उनका 'मराठी अस्मिता' का मुद्दा काम नहीं कर पाया.

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