
स्वीडन से अमेरिका काम करने जाती है ये नर्स, फ्लाइट से करती है आना-जाना
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एक नर्स अस्पताल में नौकरी करने स्वीडन से अमेरिका जाती है. अमेरिका में वह दस दिनों तक काम करती हैं. इसके बाद बाकी के दिन वह स्वीडन में रहती है. महीने में 10 दिन के जॉब में उनकी इतनी कमाई हो जाती है कि वह आराम से दोनों जगह के खर्चे निकाल लेती हैं.
एक महिला स्वीडन से अमेरिका काम करने जाती हैं. वह अमेरिका के कैलिफोर्निया में स्थित एक अस्पताल में नर्स की नौकरी करती हैं. इस जॉब के लिए वह प्लेन से 8 हजार किलोमीटर की यात्रा करती हैं. महीने के 10 दिन वह अमेरिका में रहती हैं. बाकी दिन वह अपने परिवार के साथ स्वीडन में बिताती हैं.
न्यूयॉर्क पोस्ट की रिपोर्ट के अनुसार, एक बच्चे की मां एल रेफाई अमेरिका के एक एनआईसीयू में नर्स हैं. वह न तो स्थायी तौर पर अमेरिका में रहती हैं और न स्वीडन में. वह प्लेन से स्वीडन से अमेरिका आना-जाना करती हैं. अमेरिका में वह 10 दिन काम करती हैं. फिर 20 दिन स्वीडन में रहती हैं.
10 दिनों की कमाई में निकल जाता है पूरे महीने का खर्च रेफाई ने बताया कि अमेरिका में सिर्फ 10 दिन काम करने से उसकी इतनी कमाई हो जाती है कि स्वीडन में वह अपने महीने के बिलों का भुगतान आराम से कर लेती हैं और प्लेन से आने-जाने और अमेरिका में रहने का खर्च भी निकाल लेती हैं.
उन्होंने कहा कि सुनने में भले ये रोमांचक लगता हो कि हर महीने फ्लाइट से अमेरिका जाकर नौकरी करना और फिर वापस स्वीडन आकर रहना.हर कोई सोचता है कि दो देशों के बीच जीवन एक सपना है, लेकिन मैं आपको बताती हूं कि ऐसा नहीं है.
सोशल मीडिया पर शेयर करती हैं अपने अनुभव 32 साल की एल रेफाई ने सोशल मीडिया पर काफी एक्टिव रहती हैं और अपने दोहरे जीवन के अनुभव साझा करती रहती हैं. उन्होंने बताया कि कैसे दो महाद्वीपों में रहने की अपने कुछ नुकसान भी हैं. इसमें लगातार नौ घंटे के समय के गैप की मुश्किल भरपाई, दोनों जगहों पर प्रियजनों से अलग-थलग रहना और किसी भी स्थान पर 100% घर जैसा महसूस नहीं करना शामिल हैं.
लगातार यात्रा के थोड़े नुकसान भी हैं उन्होंने बताया कि दुर्भाग्यवश लगातार यात्रा करने की बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है. इससे अक्सर लंबी अवधि की नौकरी करने वालों को बहुत अधिक समय और धन की हानि होती है. फिर भी 9 से 5 बजे की नौकरी करने वाले लोगों का दावा है कि इससे मिलने वाले लाभ इन सब परेशानियों की भरपाई कर देते हैं.

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