
संतों को क्यों दी जाती है भू-समाधि? 1200 वर्ष पुरानी है परंपरा
Zee News
माना जाता है कि संतों को भू-समाधि देने कि परंपरा 1200 वर्ष पुरानी है. 9वीं शताब्दी में आदिशंकराचार्य ने भी भू-समाधि ली थी, जिन्हें भगवान विष्णु (Lord Vishnu) का अवतार माना जाता है. आदिशंकराचार्य ने ही भारत की चारों दिशाओं में मठों की स्थापना की थी.
नई दिल्ली: हिंदू धर्म में माना जाता है कि शरीर नश्वर है और आत्मा अमर है. हिंदू परंपरा में मृत्यु के बाद शरीर का दाह संस्कार इसलिए किया जाता है ताकि शरीर से आत्मा का मोह समाप्त हो जाए. लेकिन जब किसी संत की मृत्यु होती है तो उन्हें भू-समाधि या जल समाधि दी जाती है, उनका दाह संस्कार नहीं किया जाता. इसी परंपरा के तहत बुधवार को महंत नरेंद्र गिरि (Mahant Narendra Giri) को भी उत्तर प्रदेश के प्रयागराज (Prayagraj) के बाघंबरी मठ में भू-समाधि दी गई. दो दिन पहले महंत नरेंद्र गिरि ने आत्महत्या कर ली थी, हालांकि जांच के बाद ही ये पता चलेगा कि उन्होंने सच में आत्महत्या की थी या फिर उनकी हत्या की गई है?
महंत नरेंद्र गिरि ने अपने सुसाइड नोट (Suicide Note) में लिखा था कि उन्हें उनके मठ में उस नींबू के पेड़ के नीचे भू-समाधि दी जाए जिसे उन्होंने ही लगाया था. जिस स्थान पर महंत नरेंद्र गिरि को भू-समाधि दी गई है उसी के पास उनके गुरू को भी समाधि दी गई थी. संत परंपरा में अक्सर शिष्यों को उनके गुरुओं के समाधि स्थल के पास ही समाधि दी जाती है. इससे पहले बुधवार सुबह उनके शव का पोस्टमार्टम किया गया और डॉक्टरों ने इसकी रिपोर्ट उत्तर प्रदेश पुलिस (UP Police) को सौंप दी है, जिसे अभी सार्वजनिक नहीं किया गया है. इसके बाद नरेंद्र गिरि के पार्थिव शरीर को फूलों से सजे रथ पर रखकर संगम ले जाया गया. माना जाता है कि यहीं पर गंगा, जमुना और सरस्वती नदियों का संगम होता है. यहीं उनके पार्थिव शरीर को स्नान कराया गया और फिर उन्हें लेटे हनुमान मंदिर के दर्शन कराए गए. महंत नरेंद्र गिरि प्रयागराज के लेटे हनुमान मंदिर के भी महंत थे.
