
संघ के 100 साल: 1965 में सीजफायर की खबर सुनकर निराश हो गए थे गुरु गोलवलकर
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1965 की भारत-पाकिस्तान की लड़ाई में अनुकूल परिस्थितियों के बावजूद सरकार ने सेना की विजयी बढ़त को रोक दिया था. गुरु गोलवलकर सरकार के इस फैसले से बेहद दुखी हुए. उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि पाकिस्तान को सबक सिखाने और उसकी कमर तोड़ने का इतना सुनहरा मौका गंवाना एक बड़ी भूल थी. पीएम शास्त्रीजी ने गोलवलकर की नाराजगी पर क्या कहा. RSS के 100 सालों के सफर की 100 कहानियों की कड़ी में आज पेश है वही कहानी.
गुरु गोलवलकर हमेशा इस बात को लेकर प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की तारीफ करते रहे कि कम से कम उन्होंने जवाहर लाल नेहरू की तरह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को अछूत नहीं माना था. जब 1965 का भारत-पाक युद्ध हुआ तो ऑल पार्टी मीटिंग में संघ प्रमुख के तौर पर उन्हें भी सलाह लेने के लिए आमंत्रित किया था. उनसे सहयोग भी मांगा. जबकि संघ कोई राजनैतिक दल नहीं था, फिर भी सभी दलों के साथ बुलाया था. बावजूद इसके कई बातों पर वो शास्त्री से खुश नहीं थे, भारत पाक युद्ध में भी ना वो सीज फायर के फैसले से खुश थे और ना ही ताशकंद में हुए भारत-पाक समझौते में शास्त्रीजी के जाने पर. बल्कि उन्हें रोका भी था. काश वो रुक जाते. ऐसे ही कई और मुद्दे भी थे. गोलवलकर ने घुसपैठियों से मुक्ति का फॉर्मूला शास्त्री को बताया
गुरु गोलवलकर की मुलाकात एक बार लाल बहादुर शास्त्री से हुई थी, जब शास्त्री गृह मंत्री थे. इस मुलाकात से पहले ही दिल्ली में एक बड़ा प्रदर्शन हुआ था, जिसमें हजारों प्रदर्शनकारियों ने असम में बांग्लादेश की घुसपैठ के विरोध में ‘हिंदुओ, जागो’ लिखे बैनर लहराए थे. इस पृष्ठभूमि में, स्वाभाविक रूप से यह सवाल बैठक में उठा. शास्त्री ने कहा कि, “मुस्लिम घुसपैठियों की पहचान करना मुश्किल है, क्योंकि वे स्थानीय मुसलमानों के साथ घुलमिल गए हैं”. तब गुरु गोलवलकर ने सुझाव दिया कि स्थानीय नागरिकों को चेतावनी दी जानी चाहिए कि घुसपैठियों को शरण देने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी और उन्हें मताधिकार से वंचित कर दिया जाएगा. अगर वे जवाब नहीं देते हैं, तो उन्हें भी निकाल दिया जाएगा. उसी समय, गोलवलकर ने शास्त्रीजी से कहा, “शायद आप ऐसा नहीं कर पाएंगे, क्योंकि यह कांग्रेस पार्टी के चुनावी गणित के अनुरूप नहीं है.” अंततः, ठीक यही हुआ. समय बीतने के साथ-साथ, यह समस्या और भी गंभीर होती चली गई. नेपाल के राजा के मामले में शास्त्री राजी थे नेहरू विरोध में
जब नेपाल के राजा ने लोकतांत्रिक सरकार का प्रयोग करके देखा और बाद में उसे भंग कर दिया तो भारत ने उससे रिश्ते एक तरह से खत्म कर दिए थे. लेकिन गुरु गोलवलकर को भारत-नेपाल के प्राचीन और सांस्कृतिक रिश्तों की चिंता थी. उनकी प्रबल इच्छा थी कि नेपाल और भारत के बीच घनिष्ठ संबंध फिर से स्थापित हों, क्योंकि दोनों देशों की धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराएं एक समान थीं. उन्होंने अपनी नेपाल यात्रा के दौरान इस संबंध में राजा से बात की. राजा ने इस विचार को सहर्ष स्वीकार कर लिया. गुरु गोलवलकर ने राजा से संघ के किसी समारोह में भाग लेने के लिए भारत आने का अनुरोध किया. राजा सहर्ष सहमत हो गए और गोलवलकर ने उन्हें आश्वासन दिया कि उनकी स्वीकृति दिल्ली स्थित सरकारी नेताओं को बता दी जाएगी. गृह मंत्री लाल बहादुर शास्त्री 1 मार्च, 1963 को काठमांडू आने वाले थे. गुरु गोलवलकर ने राजा से दोनों देशों के बीच मैत्रीपूर्ण संबंधों को मजबूत करने के उद्देश्य से उनसे खुलकर बातचीत करने का अनुरोध किया.
भारत लौटते ही गुरु गोलवलकर ने लाल बहादुर शास्त्री और पंडित नेहरू को पत्र लिखा. नेपाल के राजा से हुई अपनी मुलाकात और स्थिति के आकलन के बारे में उन्होंने लिखा. “यदि हम नेपाल के साथ अपने संबंधों को सुधारें, उसे उचित सम्मान दें, उसके साथ अपने मैत्रीपूर्ण संबंधों को मजबूत करें और उसकी शैक्षिक, आर्थिक और अन्य आवश्यकताओं को ध्यान में रखें, तो वह देश वास्तव में हमारा मजबूत और भरोसेमंद सहयोगी और हमारी सीमाओं का रक्षक बन सकता है. चूंकि हमारे सभी हित आपस में घनिष्ठ रूप से जुड़े हुए हैं, इसलिए हमारी अपनी सुरक्षा की दृष्टि से भी दोनों देशों के बीच सच्चे और मैत्रीपूर्ण संबंध स्थापित करना आवश्यक है. दोनों देशों के बीच जो कड़वाहट पैदा हुई है, वह भारतीय अधिकारियों के जानबूझकर या अनजाने में उदासीन और असंवेदनशील रवैये के कारण है. उसे दूर किया जाना चाहिए और यदि आवश्यक हो तो ऐसे अधिकारियों को अधिक संवेदनशील अधिकारियों से बदला जाना चाहिए. मुझे कोई संदेह नहीं है कि आप इन सभी कारकों को ध्यान में रखेंगे और भारत-नेपाल संबंधों को एक मजबूत और मैत्रीपूर्ण आधार पर स्थापित करने में सफल होंगे.”
बाद में, 1965 में अटल बिहारी वाजपेयी ने शास्त्री से जब मुलाकात की तो शास्त्री ने गुरु गोलवलकर की उद्देश्यपूर्ण नेपाल यात्रा की दिल से प्रशंसा की. उन्होंने कहा कि गुरु गोलवलकर ने वहां अनुकूल वातावरण बनाकर भारत-नेपाल मित्रता को मजबूत करने के अपने कार्य का तीन-चौथाई भाग पहले ही पूरा कर लिया है. हालांकि बाद में पंडित नेहरू को ये अच्छा नहीं लगा कि कोई राष्ट्राध्यक्ष भारत आकर किसी गैरसरकारी संगठन के कार्यक्रम में भाग ले. नेपाल के राजा को कई बार की कोशिशों के बाद भी उन्हें भारत आने की अनुमति नहीं मिली. तब नेपाल के राजा महेन्द्र ने संघ के कार्यक्रम के लिए अपना संदेश एक पत्र में भेजा था. हालांकि बाद में पंडित नेहरू और शास्त्री ने नेपाल से रिश्ते सुधार लिए थे. गुरु गोलवलकर इसी बात से खुश थे कि कम से कम उस पहल का उद्देश्य तो पूरा हुआ. सीजफायर की खबर सुनकर निराश हो गए थे गुरु गोलवलकर
पाक के खिलाफ अनुकूल परिस्थितियों के बावजूद, दिल्ली में सरकार ने सेना की विजयी बढ़त को रोक दिया, जाहिर तौर पर पश्चिमी और रूसी दबाव के कारण. गुरु गोलवलकर सरकार के इस फैसले से बेहद दुखी हुए. उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि पाकिस्तान को सबक सिखाने और उसकी कमर तोड़ने का इतना सुनहरा मौका गंवाना एक बड़ी भूल थी. जब युद्धविराम की घोषणा हुई, तो उन्होंने कहा कि यह सिर्फ एक अंतराल है, पाकिस्तान को पुनः हथियारबंद होने और उचित समय पर फिर से हमला करने का मौका दिया गया है.

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