
श्रीलंका को कई बार संकट से निकालने वाले महिंदा राजपक्षे के ही सामने कैसे बर्बाद हो गया देश?, जानें क्रोनोलॉजी
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श्रीलंका अपने इतिहास के सबसे भीषण आर्थिक संकट से गुजर रहा है. पूरे देश में इमरजेंसी लागू है. महिंदा राजपक्षे ने प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया है. वहीं उनके मंत्रिमंडल में स्वास्थ्य मंत्री रहे प्रोफेसर चन्ना जयसुमना ने भी राष्ट्रपति को अपना इस्तीफा सौंप दिया है.
श्रीलंका के प्रधानमंत्री का पद छोड़ चुके महिंदा राजपक्षे पर जाफना में तमिलों के नरसंहार से लेकर देश को कर्ज में डूबोने तक के गंभीर इल्जाम लग चुके हैं. महिंदा राजपक्षे 2004 में श्रीलंका के 13वें पीएम बने थे. तब भी देश तमाम चुनौतियों का सामना कर रहा था लेकिन फिर भी जनता ने उन पर भरोसा जताया था. साल 2000 के बाद से श्रीलंका पर ज्यादातर राज उन्हीं का रहा, लेकिन इन्हीं दो दशकों में श्रीलंका आबाद से बर्बाद भी हो गया. जानते हैं राजपक्षे के उदय से लेकर अस्त होने तक की दास्तान.
6 अप्रैल 2004: सुनामी की आपदा को संभाला
2004 में महेंद्र राजपक्षे की प्रधानमंत्री के तौर पर ताजपोशी हुई. जिस पोर्ट सिटी हंबनटोटा पर इन दिनों चीन की एक तरह से हुकूमत चल रही है, राजपाक्षे वहीं से आते हैं. उनको पॉलेटिकल बैकग्राउंड विरासत में मिली थी. दुर्भाग्य से उसी साल दिसंबर में सुनामी आई.
सबसे ज्यादा बर्बाद होने वाले देशों में श्रीलंका दूसरे नंबर पर था. खैर चार दिन बाद ही सही राजपक्षे जाफना गए, जहां तमिलियंस पर बर्बरता की खबरों ने पूरी दुनिया में खलबली मचाई थी. सुनामी की आपदा को राजपाक्षे ने ठीक ठंग से संभाला. यही वजह थी कि अगले साल राजपाक्षे ने राष्ट्रपति चुनाव जीता.
18 नवंबर 2005: तमिल आंदोलन को दबा दिया
यह वर्ष राजपक्षे के राज का शीर्षकाल था. इससे पहले कि उनके राजकाल का हनीमून पीरिएड खत्म होता, तमिल आंदोलन ने एक बार सिर उठाया और सरकार ने उसे सख्ती से कुचल दिया. अप्रैल 2006 में त्रिंकोमाली में 100 से ज्यादा लोगों को मौत के घाट उतार दिया गया.

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