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संघ के 100 साल: विस्तारवादी चीन, तिब्बत की चिंता और गोलवलकर की टीस!

संघ के 100 साल: विस्तारवादी चीन, तिब्बत की चिंता और गोलवलकर की टीस!

AajTak
Tuesday, January 20, 2026 04:01:51 AM UTC

गुरु गोलवलकर मानते थे कि चीन स्वभाव से विस्तारवादी है और निकट भविष्य में चीन द्वारा भारत पर आक्रमण करने की पूरी संभावना है. उन्होंने भारत सरकार को हमेशा याद दिलाया कि चीन से सतर्क रहने की जरूरत है. लेकिन गोलवलकर जब जब तिब्बत की याद दिलाते थे उन्हों 'उन्मादी' कह दिया जाता था. RSS के 100 सालों के सफर की 100 कहानियों की कड़ी में आज पेश है यही कहानी.

तिब्बत और भारत के बहुत प्राचीन रिश्ते रहे हैं. तिब्बत में भी पुरानी मान्यता है कि कुरुक्षेत्र में हुए महाभारत युद्ध के बाद यहां से गए एक राजा रुपति ने ही तिब्बत की शासन व्यवस्था को व्यवस्थित किया था. किसी भारतीय नागरिक को कैलाश मानसरोवर की यात्रा करने और किसी तिब्बती नागरिक को बोधगया की यात्रा करने के लिए इतिहास में पहले कभी भी वीजा की जरूरत नही पड़ती थी. सातवीं शताब्दी में तिब्बत में गुरू पद्म संभव द्वारा बौधर्म के प्रसार के बाद से तो तिब्बत भारत को अपना गुरू आर्यभूमि मानने लगा था. ऐसे में सैकड़ों साल से सांस्कृतिक रिश्ते भी मजबूत थे. RSS में हमेशा से ही चीन और नेपाल जैसे देशों से अच्छे रिश्तों को लेकर चिंता रही है. ये चिंता इतनी थी कि चीनी आक्रमण से 11 साल पहले ही गुरु गोलवलकर ने पंडित नेहरू को चीन के रुख को लेकर चेतावनी दी थी और उसके बाद वो लगातार इस मुद्दे को अलग अलग मंचों पर उठाते रहे.

चीनी आक्रमण हुआ, उसके दशकों बाद लोग सस्ते सामान के चक्कर में चीन के प्रति उदार रुख रखने लगे. यहां तक कि पिता की हार के चलते कभी इंदिरा गांधी ने चीन को लेकर नरम रुख नहीं दिखाया, पर उन्हीं की पार्टी की सरकार में बाद में कांग्रेस ने चीन की कम्युनिस्ट पार्टी से समझौता कर लिया, राजीव गांधी फाउंडेशन को तो चीन की तरफ से भारी चंदा भी मिला. ऐसे में तिब्बत को तो सब भूल ही गए. लेकिन RSS नहीं चाहता था कि लोग तिब्बत को भूल जाएं. एक बड़ी पहल सरसंघचालक केएस सुदर्शन ने की, जिसके चलते भारतीय तिब्बत को भूल नहीं सकते.  11 साल पहले ही गुरु गोलवलकर ने चेताया था

सीपी भिषिकर गुरु गोलवलकर की जीवनी में लिखते हैं कि, “सन् 1951 में ही गुरुजी ने कर्नाटक के शिमोगा में प्रेस को एक बयान जारी किया था, जिसमें उन्होंने कहा था, ‘चीन स्वभाव से विस्तारवादी है और निकट भविष्य में चीन द्वारा भारत पर आक्रमण करने की पूरी संभावना है.’ यह चेतावनी तिब्बत में चीन की सैन्य कार्रवाई के संदर्भ में थी. उन दिनों श्री गुरुजी  ने बार-बार चेतावनी दी थी कि भारत ने तिब्बत को चीन को थाली में परोसकर एक बहुत बड़ी भूल की है. उन्होंने कहा था कि भारत सरकार ऐसी अदूरदर्शिता दिखा रही है जिससे बचने के लिए अंग्रेजों ने भी अत्यधिक सावधानी बरती थी., विशेष रूप से, वे अक्सर कहते थे कि चीन में कम्युनिस्ट क्रांति के मद्देनजर हमें यहां के उन छल-स्तंभकारों से सावधान रहना चाहिए जो कम्युनिस्ट आक्रमणकारियों के साथ मिले हुए हैं.”   ‘पांचजन्य’ के 18 मई 1959 के अंक  के एक लेख में उन्होंने चेतावनी दी थी कि केवल भारत ही नहीं बल्कि पूरे एशिया को हमेशा सतर्क रहना चाहिए. लेकिन गुरु गोलवलकर जब जब तिब्बत की याद दिलाते थे, उस वक्त की मीडिया उनके लिए ‘युद्ध उन्मादी’ जैसे शब्द प्रयोग किया करती थी. स्वाभाविक रूप से, भारत-चीन संघर्ष गुरु गोलवलकर की 2 अप्रैल, 1962 को महाराष्ट्र में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस का मुख्य विषय बना. युद्ध खत्म होने के बाद भी गुरु गोलवलकर ने 23 दिसम्बर 1962 को दिल्ली के रामलीला मैदान में प्रेस कॉन्फ्रेंस की.

RSS के सौ साल से जुड़ी इस विशेष सीरीज की हर कहानी 

दिल्ली में उन्होंने कहा, “मुझे यह कहते हुए खेद है कि बार-बार चेतावनी देने के बावजूद, सरकार ने इस गंभीर संभावना को अनदेखा करना ही बेहतर समझा. लगभग दो महीनों से चीनी हमारी धरती पर आक्रमण कर रहे थे और अब सरकार स्वीकार करती है कि आक्रमण हुआ है. वास्तव में, यह आक्रमण 10 से 12 साल पुराना है. यहां तक ​​कि मुझ जैसे एक साधारण व्यक्ति ने भी लगभग दस साल पहले उन व्यवस्थित प्रयासों का जिक्र किया था जो चीनी हमारे क्षेत्र में प्रवेश करने और उसमें अपनी जड़ें जमाने के लिए कर रहे थे. कुछ अन्य जानकार लोगों ने भी इस बारे में चेतावनी दी थी. लेकिन हमारे नेता विश्व भाईचारे, हिंदी-चीनी भाई-भाई, पंच शीला और ऐसे ही अच्छे-अच्छे नारों में इतने खो गए थे कि उन्होंने इस जैसी गंभीर समस्या पर ध्यान देने के बारे में सोचा तक नहीं.”

लाखों स्वयंसेवकों को संबोधित करते हुए वहां उन्होंने तिब्बत की मुक्ति का आह्वान भी किया था और भारत सरकार से गुजारिश की थी कि तिब्बत की निर्वासित सरकार को मान्यता दी जाए. पूरे देश को चीन की हार से धक्का लगा था, गोलवलकर कैसे अछूता रहते. उसके बाद उनके भाषणों में यही टीस उभर के आती रही.

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