
क्या पहले ही हार मान चुका यूरोप, क्यों Trump से बचाने के लिए ग्रीनलैंड में तैनात किए महज तीन दर्जन सैनिक?
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यूरोप में कुछ बेहद तेजी से दरक रहा है. ये यूरोपीय संघ और अमेरिका का रिश्ता है, जिसकी मिसालें दी जाती थीं. छोटा‑मोटा झगड़ा पहले से था, लेकिन ग्रीनलैंड ने इसे बड़ा कर दिया. डोनाल्ड ट्रंप लगातार दोहरा रहे हैं कि उन्हें हर हाल में ग्रीनलैंड चाहिए. यूरोप अड़ा हुआ है कि अमेरिका ही विस्तारवादी हो जाए तो किसकी मिसालें दी जाएंगी.
शीत युद्ध के दौर को बताते हुए एक उपन्यास आया था- द माउस दैड रोर्ड. इसमें एक छोटे-से यूरोपीय देश ने अमेरिका पर हमला कर दिया था. वो जानता था कि हार पक्की है, लेकिन उसे यह भी पता था कि इसके बाद यूएस उसके यहां मानवीय और आर्थिक मदद की बौछार कर देगा. कुछ यही स्थिति अभी यूरोप की दिख रही है. उसने ग्रीनलैंड लेने की अमेरिकी जिद के खिलाफ वहां अपने तीन दर्जन सैनिक भेज दिए.
वेनेजुएला में सत्ता हिलाने के बाद ट्रंप प्रशासन का टारगेट ग्रीनलैंड है. यह देश उसे हर हाल में चाहिए. डेनमार्क के अधीन अर्ध स्वायत्त तौर पर काम करते देश को अमेरिका अपनी नेशनल सिक्योरिटी से जोड़ रहा है.
दरअसल यह आर्कटिक देश यूरोप और उत्तरी अमेरिका के बीच बसा हुआ है. इसी वजह से इसकी रणनीतिक अहमियत बढ़ जाती है. डेनमार्क इसपर राजनीतिक कंट्रोल रखता है, लेकिन अमेरिका और कनाडा हमेशा इसमें रुचि रखते रहे. अब ट्रंप ने सीधे ग्रीनलैंड को खरीदने और अपना स्टेट बनाने की बात कह डाली.
ग्रीनलैंड वैसे तो बेहद छोटी आबादी वाला देश है, जिसके पास आर्थिक संसाधन भी अपने नहीं. डेनमार्क ही उसे मदद देता है. ऐसे में चतुराई तो ये भी थी कि दोनों देश यूएस का प्रस्ताव मान लें, लेकिन ये हुआ नहीं. न तो ग्रीनलैंडर्स को खुद पर अमेरिकी ठप्पा चाहिए, न ही डेनमार्क अपनी ताकत कम करना चाहता था. दोनों ने कई महीनों में कई बार खुले तौर पर मना किया कि उन्हें अमेरिका से लेना-देना नहीं. अब ट्रंप नाराज हैं. वे कह रहे हैं कि अगर सीधे न मानें तो अमेरिकी मिलिट्री हमला करते हुए उसपर कब्जा कर लेगी.
यहीं तस्वीर में आता है यूरोप. यूरोपीय संघ मानता है कि ट्रंप को जबर्दस्ती नहीं करनी चाहिए. ग्रीनलैंड डेनमार्क के अधीन है और डेनमार्क यूरोप का अहम देश है. अगर कोई ताकतवर देश दबाव बनाकर किसी और की जमीन लेना चाहे, तो इससे अंतरराष्ट्रीय नियम कमजोर पड़ जाएंगे. यूरोप को डर है कि अगर ऐसा उदाहरण बना, तो आगे चलकर कोई भी बड़ा देश दूसरों की जमीन पर नजर डाल सकता है.
दूसरी बड़ी वजह आर्कटिक इलाका है. ग्रीनलैंड इस ठंडे इलाके में बहुत अहम जगह पर है. यहां से समुद्री रास्तों, तेल, गैस और दूसरी खनिज संपदा पर नजर रखी जा सकती है. यूरोप नहीं चाहता कि आर्कटिक में सिर्फ अमेरिका की पकड़ मजबूत हो. इससे रूस और चीन के साथ टेंशन बढ़ सकती है, जिसका असर अमेरिका पर बाद में होगा, लेकिन यूरोप पर पहले दिखेगा.

दुनिया में तीसरे विश्व युद्ध जैसी स्थिति बनने की आशंका बढ़ रही है. अमेरिका की अंतरराष्ट्रीय नीतियां विवादों में हैं, जिसमें राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों की तुलना हिटलर की तानाशाही से की जा रही है. वेनेज़ुएला पर हमला करने और ग्रीनलैंड पर कब्ज़ा करने की धमकी के बाद अमेरिका ने यूरोप के आठ NATO देशों पर टैरिफ लगाया है.

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