
मोदी की टक्कर में कौन? जानें-राहुल, ममता, नीतीश और केजरीवाल में से किसमें कितना दम!
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बिहार की सियासत में नीतीश कुमार ने बीजेपी खेमा छोड़कर महागठबंधन में एंट्री कर ली है. उन्होंने फिर से मुख्यमंत्री पद की शपथ लेते ही 2024 के लोकसभा चुनाव का बिगुल फूंक दिया है, जिसकी गूंज पटना से लेकर दिल्ली तक सुनाई पड़ रही है. इस तरह मोदी के विकल्प के रूप में विपक्ष को एक और नेता मिल गया है. जबकि पहले राहुल गांधी से लेकर ममता बनर्जी और अरविंद केजरीवाल तक विपक्ष के चेहरे के तौर पर देखे जा रहे थे.
नीतीश कुमार बीजेपी के नेतृत्व वाली एनडीए से नाता तोड़कर 'महागठबंधन' में लौट आए. नीतीश पूरा मन बनाकर बीजेपी से अलग हुए हैं और जिस तरह मुख्यमंत्री की कुर्सी संभालने के बाद अपने तेवर दिखाए हैं, वो एक तरह से बीजेपी और मोदी को सीधे चुनौती है. उन्होंने 2022 में ही 2024 के युद्ध का ऐलान कर हवा दे दी है जो संकेत देती है कि वह भी विपक्ष का चेहरा बनने का लिए तैयार हैं.
पीएम मोदी के खिलाफ खुद को विपक्ष की पिक्चर में लीड रोल के लिए पहले से पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से लेकर कांग्रेस नेता राहुल गांधी और आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल बेताब हैं. दिल्ली दरबार का रास्ता तय करने और विपक्ष का चेहरा बनने की चाह रखने वाले इन चारों ही नेताओं की अपनी-अपनी सियासी ताकत और कमजोरियां हैं. इंडिया टुडे ग्रुप के कंसल्टिंग एडिटर राजदीप सरदेसाई की नजर में क्या हैं इन नेताओं की खूबियां और खामियां आइये जानते हैं.
नीतीश कुमार की ताकत
1. हिंदी पट्टी वाले बड़े राज्य से आते हैं दिल्ली के सत्ता का रास्ता हिंदी बेल्ट वाले राज्यों से होकर गुजरता है. यही वजह है कि नरेंद्र मोदी को भी सीएम से पीएम की कुर्सी तक पहुंचने के लिए गुजरात के बजाय उत्तर प्रदेश को अपनी कर्मभूमि बनाना पड़ा था. नीतीश कुमार की यही सबसे बड़ी ताकत है कि वो बिहार से आते हैं. बिहार ही नहीं बल्कि हिंदी पट्टी वाले राज्यों में नीतीश कुमार की अपनी एक पहचान है.
2. सत्ता चलाने का लंबा अनुभव नीतीश कुमार के पास शासन चलाने का अच्छा खासा अनुभव है. चार दशक के लंबे सियासी सफर में नीतीश ने सफलता के कितने पड़ाव पार किए हैं. केंद्र में मंत्री के तौर पर काम करने से लेकर पिछले 17 सालों से बिहार की सत्ता के नीतीश कुमार धुरी बने हुए हैं. आठवीं बार मुख्यमंत्री बने हैं. सत्ता का ये लंबा अनुभव उनके लिए 2024 में एक तरह से सियासी संजीवनी साबित हो सकता है.
3. नीतीश ओबीसी नेता हैं नीतीश कुमार ओबीसी समुदाय के कुर्मी जाति से आते हैं, जो उनके लिए एक बड़ी ताकत बन सकता है. मौजूदा दौर में देश की राजनीति ओबीसी केंद्रित हो गई है. बीजेपी ने नरेंद्र मोदी को पीएम का कैंडिडेट बनाया था तो उन्हें ओबीसी नेता को तौर पर पेश किया था. वहीं, नीतीश कुमार की पहचान एक ओबीसी नेता के तौर पर रही है. नीतीश का कुर्मी समाज बिहार से लेकर यूपी, एमपी, छत्तीसगढ़ और गुजरात में अच्छी खासी संख्या में है. ऐसे में नीतीश कुमार के लिए ओबीसी का होना एक ट्रंप कार्ड साबित हो सकता है.

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