
मनरेगा बन गया भ्रष्टाचार का अड्डा, लेकिन बहस खामियों के बजाय सिर्फ नाम बदलने पर
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मनरेगा में तमाम खामियां रही है. फिलहाल तो देर के हर कोने से इस योजना के नाम पर भ्रष्टाचार के किस्से सुनाई दे रहे हैं. कुछ महीने पहले गुजरात के एक मंत्री के दो बेटों कि गिरफ्तार किया गया. पर मंत्री महोदय बच गया. एक वरिष्ट आईएएस अधिकारी की भी गिरफ्तारी हो चुकी है.
महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) 2005 में लागू हुई, जो भारत की सबसे बड़ी ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के रूप में लोकप्रिय हुई. पर जल्द ही यह योजना भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गई. मोदी सरकार इस योजना मनरेगा की जगह नया कानून VB-G RAM G लाने जा रही है.
VB-G RAM G यानी विकसित भारत गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण). बुधवार को इस योजना से संबंधित बिल लोकसभा में पेश किया गया, जो गुरुवार को पास भी हो गया. हैरानी की बात ये है कि इस योजना के नाम बदलने को लेकर तो जबरदस्त बहस हो रही है लेकिन इस योजना की खामियों, विशेषकर भ्रष्टाचार पर नहीं. वास्तव में अगर मनरेगा योजना की खामियों पर ध्यान दिया गया होता ये एक बहुत प्रभावशाली रोजगार योजना का रूप ले सकती थी.
दो दशकों में यह भ्रष्टाचार का पर्याय बन चुकी है. विभिन्न रिपोर्ट्स, जांचों और अध्ययनों से पता चलता है कि योजना में फर्जी जॉब कार्ड, घोस्ट वर्कर्स, फर्जी मस्टर रोल्स, सामग्री की अनियमित खरीद और फंड की हेराफेरी जैसे मुद्दे भरे पड़े हैं. हम विभिन्न राज्यों के उदाहरणों से देख सकते हैं कि कि कैसे डिजाइन, कार्यान्वयन, निगरानी और फंडिंग की कमियों ने इसे भ्रष्टाचार का अड्डा बना दिया है.
मनरेगा की संरचनात्मक खामियां: डिजाइन से ही समस्या की जड़
मनरेगा की मूल डिजाइन डिमांड-ड्रिवन है, यानी मांग पर आधारित. ग्रामीण परिवार खुद काम की मांग करते हैं, और सरकार को 15 दिनों में काम देना होता है, अन्यथा बेरोजगारी भत्ता. यह अवधारणा आदर्श है, लेकिन व्यावहारिक रूप से यह भ्रष्टाचार को आमंत्रित करती है. पहली बड़ी खामी है फर्जी मांग का निर्माण. ग्राम पंचायत स्तर पर सरपंच, रोजगार सेवक और स्थानीय अधिकारी फर्जी जॉब कार्ड बनाकर या मौजूद मजदूरों के नाम पर काम दिखाकर फंड हड़प लेते हैं. CAG रिपोर्ट्स में पाया गया कि 2017-2021 के बीच देशभर में लाखों फर्जी जॉब कार्ड थे, जिससे करोड़ों रुपये की हेराफेरी हुई.
योजना की खामी यह है कि मांग की सत्यापन प्रक्रिया कमजोर है. केवल आधार लिंकिंग पर निर्भर, जो ग्रामीण क्षेत्रों में अधूरा है. 2025 में भी कई राज्यों में आधार कवरेज 80% से कम है, जिससे फर्जी एंट्री आसान हो जाती है. दूसरी खामी काम की गुणवत्ता और एसेट क्रिएशन की कमी है. योजना में काम मुख्य रूप से जल संरक्षण, सड़क निर्माण, तालाब खुदाई जैसे होते हैं. लेकिन मॉनिटरिंग की कमी से ये खोदना-भरना बन जाते हैं. पार्लियामेंट्री पैनल ने 2022 में रिपोर्ट किया कि योजना में भ्रष्टाचार, देरी वाले मस्टर रोल्स और वेज-मटेरियल पेमेंट में बड़ी लीकेज है.

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