
बोतलबंद पानी पर PIL खारिज, CJI बोले-'गांधी जी की तरह देश घूमिए, तब दिखेगी पानी की हकीकत'
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सुप्रीम कोर्ट ने बोतलबंद पानी की गुणवत्ता से जुड़ी जनहित याचिका की सुनवाई से इनकार कर दिया है। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि देश में पीने के पानी की उपलब्धता प्राथमिकता है और बोतलबंद पानी के मानकों पर विचार करने के लिए सक्षम प्राधिकरण मौजूद है। याचिका में बोतलबंद पानी के पुराने मानकों और प्लास्टिक से रिसने वाले रसायनों के स्वास्थ्य प्रभावों को लेकर चिंता जताई गई थी। कोर्ट ने याचिकाकर्ता को संबंधित प्राधिकरण के समक्ष अपनी बात रखने की सलाह दी।
देश में बोतलबंद पानी की गुणवत्ता के मौजूदा मानकों को चुनौती देने वाली जनहित याचिका (PIL) पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई से इनकार कर दिया है. सुनवाई के दौरान भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस सूर्यकांत ने याचिका को 'शहरी नजरिए से जुड़ा हुआ' बताते हुए कहा कि देश की जमीनी हकीकत इससे कहीं ज्यादा गंभीर है.
CJI ने टिप्पणी करते हुए कहा, 'देश के बड़े हिस्से में लोगों को पीने का पानी तक नसीब नहीं है. ऐसे में पानी की गुणवत्ता का मुद्दा बाद में आता है. ग्रामीण इलाकों में लोग ज़मीन का पानी पीते हैं. आप बोतलबंद पानी में कौन-सा तत्व जोड़ा जाए या हटाया जाए, इस पर कोर्ट से निर्देश चाहते हैं, ये एक लग्ज़री इश्यू है.'
याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि बोतलबंद पानी को लेकर वैधानिक मानक मौजूद हैं और फूड सेफ्टी स्टैंडर्ड्स को सख्ती से लागू किया जाना चाहिए. इस पर CJI ने कहा कि अगर ऐसे मानक हैं, तो उन्हें लागू करने के लिए सक्षम प्राधिकरण भी मौजूद है और वही इस पर विचार करेगा.
CJI ने सवाल उठाया, 'क्या हम भारत में पानी से जुड़ी वही चुनौतियां झेलते हैं, जो UK, सऊदी अरब या ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में हैं? क्या हम उनके जैसे मानक यहां लागू कर सकते हैं?' उन्होंने कहा कि यह याचिका ‘अर्बन फोबिया’ को दर्शाती है, जिसमें देश की असली स्थिति को नजरअंदाज किया गया है.
सुनवाई के दौरान CJI ने याचिकाकर्ता को सुझाव देते हुए कहा कि उन्हें देश के अलग-अलग हिस्सों में जाकर देखना चाहिए कि लोग किस तरह का पानी पी रहे हैं. उन्होंने महात्मा गांधी का उदाहरण देते हुए कहा, 'जब गांधी जी दक्षिण अफ्रीका से लौटे थे, तो उन्होंने पूरे देश की यात्रा की थी. याचिकाकर्ता को भी भारत की हकीकत को समझने के लिए ऐसा करना चाहिए.'
याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि यह मामला सामान्य पेयजल नहीं, बल्कि बोतलबंद पानी और प्लास्टिक से रिसने वाले रसायनों (DTPH) से जुड़ा है, जिसका सीधा असर मानव स्वास्थ्य पर पड़ता है. उन्होंने WHO के मानकों और पहले वाहनों में यूरो-2 जैसे मानकों को लागू किए जाने का हवाला भी दिया.

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