
झगड़े रोकने में लगातार असफल रहा UN, अब पाकिस्तान अगर कश्मीर मुद्दा लेकर पहुंचे तो क्या होगा?
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शिमला समझौते के तहत माना गया था कि पाकिस्तान कश्मीर के मुद्दे को इंटरनेशनल मंच पर नहीं ले जाएगा. भारत पहले से ही आपसी बातचीत के पक्ष में था. अब खुद इस्लामाबाद ये संधि तोड़ चुका. तय है कि वो जल्द ही यूएन के सामने विक्टिम कार्ड खेलेगा और कश्मीर पर अपना राग अलापेगा. लेकिन क्या इससे हमपर कोई डिप्लोमेटिक दबाव बन सकता है?
पहलगाम में आतंकी हमले के बाद भारत ने पाकिस्तान के खिलाफ कई बड़े फैसले लिए. इनमें डिप्लोमेटिक रिश्ते और सीमित करने के अलावा सिंधु जल संधि को फिलहाल के लिए रद्द करना भी है. बौखलाए हुए पाकिस्तान ने इसके जवाब में खुद को शिमला समझौते से अलग कर लिया. ये करार इसलिए था कि दोनों देश आपसी मामलों को आपस में ही सुलझाएं, लेकिन अब इस्लामाबाद अपनी घरेलू लड़ाई को ग्लोबल मंच पर ला सकता है. भले ही वो इसे फायदे का सौदा सोच रहा हो लेकिन क्या वाकई ऐसा है? क्या यूनाइटेड नेशन्स के सामने रोने-धोने से किसी देश को बेनिफिट मिल सका है?
क्या होता है बड़े मंच पर बोलने का फायदा
शिमला समझौते की वजह से पाकिस्तान कश्मीर का मुद्दा दुनिया के सामने नहीं उठा सकता था, लेकिन अब जबकि ये खत्म हो गया है, तो पाकिस्तान को रोकने वाली कोई राजनयिक अड़चन नहीं रही. अब वो कश्मीर का मुद्दा हर बड़े मंच पर उठा सकता है, जैसा कि वो दावा भी कर रहा है. लेकिन क्या इंटरनेशनल मंच पर बात रखने भर से किसी भी देश की डिमांड पूरी हो सकी है? इसका बस इतना फायदा है कि कोई देश यूएन या किसी बड़े मंच पर अपनी बात कहता है, तो दुनिया के बाकी देश सुनते हैं. मीडिया मामले को उठाता है. लेकिन डिप्लोमेटिक प्रेशर बहुत कम ही दिख पाया.
दूसरे वर्ल्ड वॉर के बाद यूएन बना ही इसलिए था कि दुनिया में शांति बनाई रखी जा सके. इसके फाउंडर देश दो चीजों पर फोकस कर रहे थे- एक युद्ध से हर हाल में बचना और ह्यूमन राइट्स को बचाए रखना. धीरे-धीरे इसमें 193 देश शामिल हो गए. ये आपस में मिलकर हो-हल्ला मचाने वाले देशों पर दबाव बनाते और उनपर काबू पाते रहे. इसके लिए ये अंब्रेला कूटनीतिक से लेकर बैकचैनल रास्ते सब अपनाता रहा. जल्द ही इसका असर दिखने भी लगा.
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