
खुशी के आंसू, तिरंगे का गौरव और इतिहास रचती बेटियां... इस जीत ने हर घर में बो दिया सपनों का बीज
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अब जब बेटियां विश्व विजेता बनी हैं तो इस जीत की रात कई घरों में माता-पिताओं ने अपनी बेटियों को क्रिकेटर बनाने का सपना पाल लिया होगा. वो भी अब अपनी बेटियों में हरमन-स्मृति, दीप्ति और शेफाली जैसी खूबियां खोजेंगे. महिला क्रिकेटरों की ये जीत इस खिताब से कहीं बड़ी है, क्योंकि ...
एक यज्ञ है. तपस्या के 52 साल. इंतजार है जो लंबा और लंबा होता जा रहा है. नाउम्मीदी का मानसून घूम-घूमकर आता है और हर बार आंखों में मायूसी की छाया छोड़कर चला जाता है. लेकिन दूसरी तरफ हैं 11 लड़कियां. हठ से भरी लड़कियां. प्रण को थामे लड़कियां. मजाज़ लखनवी ने लिखा- 'तेरे माथे पे ये आंचल बहुत ही खूब है लेकिन, तू इस आंचल से इक परचम बना लेती तो अच्छा था...' तो हाज़िरीन लड़कियों ने अपने आंचल को परचम बना लिया है. सवा सौ करोड़ लोगों की तपस्या आज फलीभूत हुई है. 52 साल बाद 11 विश्व विजेता लड़कियों ने कुछ ऐसा कर दिखाया है कि पूरा देश उन्हें अपनी बेटी कहना चाहता है. महिला क्रिकेट टीम ने 52 साल के महिला विश्व कप के इतिहास में पहला वर्ल्ड कप जीत लिया है. इन खिलाड़ियों और पूरे देश के लिए यह भावुक कर देने वाला पल है. हर कोई इसे अपनी जीत मान रहा है- आज पूरा देश पूरे लाम पर है, जो जहां पर है वतन के काम पर है.
ये जीत है भी खास. क्योंकि बीते 52 सालों में महिला खिलाड़ियों ने उपेक्षा भी सही और अपमान भी. किसी ने उन्हें मोम की गुड़िया कहा तो किसी ने उन्हें घरों तक समेट देने की ख्वाहिश पाली. लेकिन अब ये जीत आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बन गई है. ये जीत 1983 वर्ल्ड कप सरीखी जीत है, जब कपिल देव की कप्तानी में टीम इंडिया ने पहली बार वर्ल्ड कप जीता था. 83 की जीत ने भारत में क्रिकेट का रोमांच हर घर तक पहुंचाया था.
अब जब बेटियां विश्व विजेता बनी हैं तो इस जीत की रात कई घरों में माता-पिताओं ने अपनी बेटियों को क्रिकेटर बनाने का सपना पाल लिया होगा. वो भी अब अपनी बेटियों में हरमन-स्मृति, दीप्ति और शेफाली जैसी खूबियां खोजेंगे. महिला क्रिकेटरों की ये जीत इस खिताब से कहीं बड़ी है, क्योंकि उन्होंने देश की करोड़ों बेटियों के लिए लोगों का विश्वास जीता है.
52 साल का इंतजार खत्म...
1973 वो साल था, जब पहली बार महिला वनडे वर्ल्ड कप का आयोजन हुआ था. साल बीतते रहे और नए-नए चैम्पियन बनते रहे. लेकिन भारतीय महिला टीम खिताब से दूर रही. डायना एडुल्जी से लेकर मिताली राज तक, अंजुम से लेकर झूलन तक तमाम दिग्गज खिलाड़ियों ने इस पल को पाने के लिए अपना सबकुछ सौंप दिया. लेकिन ट्रॉफी भारत से दूर रही.

एक समय था जब बिहार से आईपीएल में खिलाड़ियों की मौजूदगी गिनी-चुनी होती थी. लेकिन आज 7 खिलाड़ियों का इस लीग में होना राज्य के क्रिकेट इकोसिस्टम में आए बदलाव का संकेत है. यह सिर्फ एक आंकड़ा नहीं, बल्कि उस बदलाव की कहानी है जहां कभी संसाधनों की कमी से जूझने वाला राज्य अब भारतीय क्रिकेट की मुख्यधारा में अपनी जगह बना रहा है.












