
आसमानी आफत या सिस्टम की लापरवाही... हिमाचल में बारिश से तबाही का जिम्मेदार कौन?
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बीते 24 जून से 9 जुलाई शाम 6 बजे तक की बात की जाए तो मानसून सीजन के दौरान हिमाचल प्रदेश में अब तक 72 लोगों की मौत की खबर है. इन मौतों का जिम्मेदार कौन है. क्या सिर्फ प्राकृतिक आपदा कहकर इतने बड़े नुकसान को कवर किया जा सकता है. क्या सिस्टम से सवाल नहीं पूछे जाने चाहिए कि मौसम खराब होने से पहले उन्होंने क्या तैयारियां की थीं.
देश के कई हिस्से इस वक्त भारी बारिश से जूझ रहे हैं. रविवार से अब तक कई राज्यों में हुई बारिश के बाद तबाही की तस्वीरें सामने आ रही हैं. बारिश के बाद जाम की स्थिति भी बन रही है. इस आसमानी आफत से बीते दो दिन में पंजाब और हरियाणा में 9 की मौत, राजस्थान में 7 की मौत, दिल्ली में 5 की मौत, उत्तराखंड में 5 की मौत तो हिमाचल प्रदेश में 17 लोगों की जान चली गई.
यह तो दो दिन का आंकड़ा है. बीते 24 जून से 9 जुलाई शाम 6 बजे तक की बात की जाए तो मानसून सीजन के दौरान हिमाचल प्रदेश में अब तक 72 लोगों की मौत की खबर है. 8 लोग लापता हैं, जबकि 94 लोग घायल हुए हैं. इस दौरान भूस्खलन की 39 घटनाएं सामने आई हैं. 1 जगह बादल फटा और 29 जगहों पर अचानक बाढ़ आ गई.
अधिकारियों के घिसे-पिटे जवाब
जब भी ऐसा होता है, इलाके के स्थानीय अधिकारी से लेकर जिले के जिलाधिकारी और प्रदेशों के मुख्यमंत्रियों तक के जवाब कुछ घिसे पिटे ही होते हैं. सबके जवाब वही रहते हैं कि बारिश ही इतनी हुई क्या किया जा सकता है. ऐसे में एक सवाल उठता है कि वाकई में कुछ नहीं किया जा सकता?
इसीलिए सरकारों से यह सवाल पूछा जाना जरूरी है कि क्या इस बार भी कुदरत जिम्मेदार या फिर लापरवाही का काम है और कुदरत बदनाम है? टूटते घरों, बहते पुलों, सैलाब के आगे सरेंडर करते हुए शहरों और पत्ते की तरह तैरती कारों के लिए किसे जिम्मेदार ठहराया जाए? हिमाचल प्रदेश में इस वक्त पांच हजार करोड़ से ज्यादा की तबाही मच चुकी है. मुख्यमंत्री तक अपील कर रहे हैं कि अब इसे राष्ट्रीय आपदा घोषित कर दिया जाए.
कैसे तय होगी राष्ट्रीय आपदा?

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