
आतंक का सबक, PAK में ट्रेनिंग और जंगल में ठिकाना... ऐसे पहलगाम में हमला करने पहुंचे थे TRF के आतंकी
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जांच एजेंसियों के सूत्रों के मुताबिक आतंकवादियों का ग्रुप लगातार पहलगाम के जंगल में एक जगह से दूसरी जगह घूम रहा था. शक ये भी है कि इस ग्रुप का असली टार्गेट जुलाई में शुरू होने वाली अमरनाथ यात्रा थी. मगर जुलाई में अभी वक्त था इसीलिए उन्होंने पहलगाम में उससे पहले ही सैलानियों को अपना निशाना बना लिया.
Pahalgam Attack TRF Terrorist Conspiracy: वो सर्दियों में गायब हो जाते हैं और गर्मियों में वापस लौट आते हैं. वो सड़क का इस्तेमाल नहीं करते. वो गाड़ियों में चलते. वो पैदल चलते हैं और उन्हें बाकायदा पैदल चलने की ट्रेनिंग दी जाती है. वो अपने साथ कोई गैजेट नहीं रखते. इसलिए उन तक पहुंच पाना मुश्किल हो जाता है. पहलगाम में आतंकी हमला करने वाले हमलावर भी आस-पास के जंगलों में काफी वक्त से छुपे हुए थे. फिर निहत्थे सैलानियों का कत्ल-ए-आम करने के बाद वो उसी जंगल में गुम हो गए.
30 साल पहले भी हुई थी एक वारदात तीस साल पुरानी बात है. 4 जुलाई 1995 को पहलगाम में आतंकवादियों ने 6 विदेशी पर्यटकों और उनके दो गाइड को किडनैप कर लिया था. किडनैप किए गए पर्यटकों में दो अमेरिकी, दो ब्रिटिश, एक जर्मन और एक नॉर्वे के नागरिक थे. तब आतंकवादियों की मांग भारतीय जेल में बंद जैश-ए-मोहम्मद के सरगना मौलाना मसूद अजहर कि रिहाई थी. मांग पूरी न किए जाने पर अगवा बंधकों में से एक नॉर्वे के एक्टर हैंस क्रिश्चियन ऑस्ट्रो की सरकटी लाश 13 अगस्त 1995 को बरामद हुई थी. जबकि 17 अगस्त को एक अमेरिकी बंधक जॉन चिल्ड्स किसी तरह आतंकवादियों के चंगुल से निकल भागने में कामयाब रहे. बाकी के 4 विदेशी बंधकों का आज तक कोई सुराग नहीं मिला है. माना यही जाता है कि उन चारों को भी मार दिया गया था.
आतंकियों की पहचान तीस साल बाद उसी पहलगाम में 22 अप्रैल को पांच आतंकवादियों ने वहां घूमने आए सैलानियों पर अंधाधुंध गोलियां चलाईं और जंगल में गायब हो गए. 26 सैलानियों की जान लेने वाले इन पांच आतंकवादियों में से 3 सरहद पार पाकिस्तान से आए थे. जबकि 2 इसी कश्मीर घाटी के रहने वाले हैं. हालांकि हमलावर आतंकवादी पांच थे, लेकिन फिलहाल सिर्फ 3 का चेहरा ही अभी जांच एजेंसियों को मिल पाया है. जिनकी पहचान अबु तल्हा, आसिफ फौजी और सुलेमान शाह के तौर पर हुई है. जो आतंकवादी लोकल थे, उनके लोकल होने की पहचान इसलिए उजागर हो पाई क्योंकि वो लोकल कश्मीरी जुबान और उसी लहजे में ही बात कर रहे थे. जबकि जो तीन पाकिस्तानी आतंकवादी थे, वो उर्दू जुबान में बात कर रहे थे.
पुलिस के साथ NIA भी जांच में शामिल इस हमले की जांच के लिए दिल्ली से एनआईए हाई प्रोफाइल टीम घाटी पहुंच चुकी है. टीम में इंस्पेक्टर जनरल, डिप्टी इंस्पेक्टर जनरल और सीनियर सुपरिंटेंडेंट समेत दूसरे अफसर भी शामिल हैं. एनआईए के अलावा मिलिट्री अपनी तरफ से छानबीन कर रही है. लोकल लेवल पर जम्मू कश्मीर पुलिस भी मामले की जांच और एनआईए की मदद में जुटी है. इसके अलावा इंटेलिजेंस ब्यूरो यानी आईबी भी पूरी तरह से एक्टिव है.
घने जंगलों से घिरी है बैसरन घाटी पहलगाम के जिस बैसरन घाटी में ये आतंकवादी हमला हुआ, ये पहलगाम का सबसे खूबसूरत टूरिस्ट स्पॉट है. कश्मीर घूमने आने वाले जो भी सैलानी पहलगाम पहुंचते हैं, वो यहां जरूर आते हैं. इसलिए यहां अक्सर भीड़ होती है. बैसरन घाटी तक पहुंचने का रास्ता भी कुछ ऐसा है कि अगर इमरजेंसी में वहां पुलिस या फोर्स को पहुंचना हो, तो पहुंचने में उबड़-खाबड़ रास्तों की वजह से वक्त लगता है. अमूमन लोग यहां तक या तो पैदल या फिर घोड़े से ही पहुंचते हैं. पहलगाम का ये पूरा इलाका चौतरफा जंगलों से घिरा है. ये जंगल एक तरफ हपतनार से जुड़ते हैं, तो दूसरी तरफ चंदनवाड़ी से. ये जंगल इतना बड़ा है कि इसका एक सिरा त्राल पर जाकर खत्म होता है.
आतंकियों का महफूज ठिकाना बन जाते हैं जंगल अब तक की तफ्तीश के मुताबिक सैलानियों पर हमला करने वाले आतंकवादी पहलगाम के इस बैसरन घाटी के ऊपर जंगलों में छुपे हुए थे. अंदाजा ये है कि वो यहां पिछले दो ढाई महीने से थे. असल में जैसे ही बर्फ पिघलने लगती है, ये जंगल आतंकवादियों को सबसे महफूज ठिकाना बन जाता है. ठंड के मौसम में यहां ऊपरी इलाकों में दस-दस फुट तक बर्फ रहती है. तब ऐसे मौसम में आतंकवादी यहां से निकल लेते हैं. लेकिन गर्मी शुरू होते ही बेहद घने जंगल इनके लिए छुपने का सबसे बड़ा आसरा बन जाता है. पाकिस्तान से आए और लोकल आतंकवादियों का ये ग्रुप पिछले कई महीनों से एक साथ काम कर रहा था. शक ये भी है कि पिछले साल सोनमर्ग के अंडर टनल में जो आतंकवादी हमला हुआ था, उसमें भी इसी ग्रुप का हाथ हो सकता है.

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