
Gyanvapi: सनातन ग्रंथों से लेकर अंग्रेजी इतिहासकारों तक, जानिए कैसे बताई गई है ज्ञानवापी की महिमा!
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वाराणसी की कोर्ट के आदेश के बाद ज्ञानवापी के व्यास तहखाने में 31 साल बाद पूजा-अर्चना शुरू हो गई है. कोर्ट के आदेश के बाद इन दिनों ज्ञानवापी को लेकर फिर से बहस छिड़ गई है. ज्ञानवापी का अंग्रेजी लेखकों ने अपनी किताबों में विस्तार से वर्णन किया है.
वाराणसी की एक अदालत ने 31 जनवरी बड़ा फैसला सुनाते हुए ज्ञानवापी के व्यास तहखाने में हिंदू पक्ष को पूजा करने का अधिकार दे दिया. ज़िला जज अजय कृष्ण विश्वेश के आदेश के महज 8 घंटे के भीतर मस्जिद के तहखाने में पूजा शुरु हो गई. अदालती आदेश के बाद एक बार फिर ज्ञानवापी को लेकर देशभर में बहस शुरू हो गई है. दरअसल ज्ञानवापी, सनातनी लोगों के दिल पर अंकित एक ऐसा शब्द है, जिसकी महिमा का वर्णन न केवल सनातन ग्रंथों में है बल्कि कई प्रतिष्ठित अंग्रेजी इतिहासकारों द्वारा काशी पर किए गए शोधकार्यों और उनकी पुस्तकों से भी इसकी पुष्टि होती है.
दैवीय ग्रंथों और आध्यात्मिक खोज की कहानियों से भरे सनातन ग्रंथों में अक्सर ज्ञानवापी को एक महत्वपूर्ण तीर्थ स्थल के रूप में उद्धृत किया गया है. इसी तरहत वाराणसी का अध्ययन करने वाले अंग्रेजी इतिहासकार भी इन ग्रंथों से सहमति जताते हैं. ई बी हैवेल और एडविन ग्रीव्स जैसे लेखकों ने ब्राह्मण के कुएं के किनारे बैठकर तीर्थयात्रियों को पानी पिलाने का आकर्षक विवरण प्रस्तुत किया है.
सनातन ग्रंथों में है ज्ञानवापी सहित 6 वापियों का जिक्र
ज्ञानवापी का उल्लेख सनातन ग्रंथों में भी मिलता है. स्कंद पुराण के काशी खंड में कहा गया है कि ज्ञानवापी का निर्माण स्वयं भगवान शिव ने किया था.लिंग पुराण में 6 प्रमुख वापियों यानि कुओं का जिक्र है. पहली वापी ज्येष्ठा वापी है. दूसरी वापी है ज्ञानवापी; इसे ज्ञानवापी नाम इसलिए दिया गया क्योंकि यह भगवान शिव के आशीर्वाद से बनाई गई थी और इसका पानी पीने से भक्त प्रबुद्ध हो जाते हैं और सभी प्रकार का ज्ञान प्राप्त करते हैं. तीसरी वापी का नाम कर्कोटक वापी है, जो नागकुआं के नाम से प्रसिद्ध है. चौथी वापी का नाम भद्रवापी है. पांचवी वापी शंखचूड़ वापी है और छठी वापी को सिद्ध वापी के नाम से जाना जाता है.
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अंग्रेजी लेखकों की कलम से

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