
Ground Report: ईसाई बहुल होते जा रहे पंजाब के सीमावर्ती गांव, 'मन बदलने' के मास्टर हैं पास्टर
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दिल्ली से महज कुछ घंटों की दूरी पर बसा पंजाब आंच पर रखी हांडी की तरह खदबदाता रहता है. कभी ड्रग्स, कभी NRI आबादी तो कभी अलगाव की मांग. इस शोरगुल के बीच वहां कुछ और भी बदल रहा है. बेहद नामालूम ढंग से सूबे की बड़ी आबादी ईसाई हो चुकी. इन 'बदले हुओं' की पहचान मुश्किल है. वे नाम-धाम नहीं बदलते, बस घरों से गुरु ग्रंथ साहिब को हटा जीसस को ले आते हैं.
पंजाब की पहचान है उसकी सिख आबादी और उपजाऊ जमीन. जमीन पहले ही जहरीली हो चुकी. अब सिख आबादी भी कथित तौर पर खतरे में है. साल 2011 में हुई जनगणना में वहां लगभग डेढ़ फीसदी ईसाई थे. कहा जा रहा है कि अब वे 15 पार कर चुके. लेकिन इससे सिखों पर क्या फर्क! दरअसल ये सिख ही हैं, जो काफी तेजी से चर्चों और मिनिस्ट्रीज की तरफ जाने लगे. इसमें भी बॉर्न क्रिश्चियन्स और कन्वर्टेड्स के बीच रार छिड़ी हुई है. पीढ़ियों से ईसाई रहते आए लोगों का आरोप है कि ‘नए-नयों’ की वजह से उनके धर्म का नाम खराब हो रहा है. पहली कड़ी में आपने जाना कि पंजाब की रगों-रेशों में कैसे ईसाई धर्मांतरण का जाल फैल चुका है. खुद aajtak.in की रिपोर्टर को यीशु की शरण में आने का न्यौता मिला. इस किस्त में जानिए, कैसे बदलते हुए भी अदृश्य बनी हुई है पंजाब की डेमोग्राफी! सिख-बहुल राज्य के लोग क्यों धड़ल्ले से किसी और मजहब की तरफ जा रहे हैं? कैसे काम करता है कन्वर्जन का जाल और कहां से आती है बड़ी फंडिंग?इन तमाम क्या को खोजते हुए हम पहुंचे तरन तारन, अमृतसर के जल्लूपुर खेड़ा और जालंधर. वहां हमने पास्टरों, मसीह को मानने वालों समेत लोकल नेताओं से भी बात की. मेरे फादर को दुष्ट आत्मा ने पकड़ रखा था. टेस्ट कराते तो कुछ भी नहीं आता था. फिर भी हम इलाज करवाते रहे. 'धार्मिकता' भी करते रहे. आखिरकार वे चल बसे. साल 1989 में उसी शैतान ने मुझे भी पकड़ लिया. मेरी भी सांस रुकने लगी. सब कुछ वैसा ही हो रहा था, जो फादर साहब के साथ होता था. जिसने जो कहा, हमने किया. तांत्रिक से लेकर पीर-फकीर सबको दिखाया.
साल 2005 की बात है, जब किसी ने मुझे गुड न्यूज दी. चर्च में जाकर यीशु से प्रार्थना को कहा. मैं पक्का सिख था. मसीह के बारे में सोचता कि वो अंग्रेजों के गुरु हैं. लेकिन हालत इतनी खराब थी कि सोचा, ये भी आजमा लूं. हम बॉर्डर के पास बसे एक कस्बाई चर्च पहुंचे. पास्टर ने वचन पढ़े ही थे कि मुझे शांति मिलने लगी. लगा, जैसे सिर से भारी बोझ उतर रहा हो. घर लौटकर भी मैं प्रार्थना दोहराता रहा, और दुष्ट आत्मा खुद-बखुद मुझे छोड़कर चली गई. इस बात को 20 साल हो चुके, मैं बिल्कुल ठीक हूं.
पास्टर सरबजीत सिंह हाथों में होली बाइबल लिए हुए अपनी कहानी सुना रहे हैं. जगह- तरन तारन का गोइंदवाल साहिब. ये वो इलाका है, जिसे पंजाब का पंथक बेल्ट माना जाता रहा, जहां सिख धर्म अपने सबसे गहरे रूप में मौजूद है.यहां कई गुरुद्वारे हैं. लेकिन शायद उतने ही या कहीं ज्यादा चर्च होंगे! गलियों में बने होम-चर्च किसी आम घर की तरह दिखेंगे. क्रॉस का साइन भी यहां शायद ही दिखे. भीतर जाइए तो न तो जीसस की मूर्ति लगी होगी, न ही लकड़ी की टिपिकल बेंच और मोमबत्तियां ही टिमटिमाएंगी. यहां दरी बिछी होगी, जिसपर पगड़ी लगाए करतार सिंह और कुलमीत कौर प्रेयर करती मिलेंगी. ये पेंटेकोस्टल चर्च है. और सरबजीत सिंह यहां मौजूद कई पास्टरों में से एक हैं. वे फेथ हीलिंग पर जोर देते हैं. यानी भरोसा करो और यीशु उसे पूरा करेगा. वे कहते हैं- इसी चर्च में कैंसर की एक मरीज आई. वो वैसे तो ईसाई ही थी लेकिन उसे भरोसा नहीं था. यहां आकर एक हफ्ते प्रार्थना सुनने के बाद उसने टेस्ट कराए. कैंसर खत्म हो चुका था. सरबजीत के पास कहानियों का पूरा पिटारा है, जिसमें तीन चरित्र हैं- आम आदमी, जो हारी-बीमारी से तंग हो, वे खुद जो मसीह और लाचार के बीच कनेक्ट हों, और यीशु, जो कहानी के हीरो हैं.पास्टर कोट-पैंट पहने हुए हैं, और दाढ़ी-पगड़ी भी नहीं रखते. तो क्या आपने धर्म बदल दिया? कई बार पूछने पर गोलमोल जवाब लौटता है- बाइबल में कहीं नहीं लिखा कि धर्म बदलो तभी दुष्ट आत्मा से छुटकारा मिलेगा.मतलब आप अभी भी सिख ही हैं! धर्म तो नहीं बदला, लेकिन अब मैं इसी रास्ते पर चलता हूं. खुद प्रभु ने मुझे चुना है. अब बाइबल में जो लिखा है, वही करता हूं.आपका परिवार-बच्चे, क्या वे भी इसी रास्ते पर चलते हैं? हां. वे भी यही कर रहे हैं. हम सबको विश्वास कि यीशु परमेश्वर हैं. वहीं बैठे जसवंत सिंह लगातार अरदास कर रहे हैं. पूछने पर वे प्रेयर के लिए यही शब्द इस्तेमाल करते हैं.
वे कहते हैं - 72 साल मेरी उम्र है. अभी भी मैं कुछ भी कर सकता हूं. घर में जिन लड़कियों ने मसीह को अपना लिया, उनकी पढ़ाई हो चुकी, शादियां हो गईं. वहीं इससे बाहर रहता लड़का शैतान के चंगुल में आकर मर गया. सिख धर्म छोड़कर यीशु को कब अपनाया? आंखों पर गहरा काला चश्मा लगाए जसवंत लगभग ऐंठते हुए बताते हैं- बाकी सब तो कंकड़-पत्थर हैं, यही असल परमेश्वर हैं. मैं 25 साल पहले ये जान चुका. अब बाकियों को भी गुड न्यूज देता हूं. 'गुड न्यूज देना'! चाहे आप चर्च से बाहर हों, या उसके भीतर, लगभग हर टकराने वाला आपसे ये शब्द जरूर बोलेगा.
वैसे तो इसका मतलब यीशु की चर्चा है, लेकिन मोटे तौर पर देखें तो ये प्रचार है, जिसके बारे में पहली किस्त में हम मार्केटिंग स्कीम शब्द इस्तेमाल कर चुके. सिख स्कॉलर और रिसर्चर डॉ. रणबीर सिंह फोन पर बातचीत के दौरान खुद ये टर्म इस्तेमाल करते हैं. वे कहते हैं- विदेशी फंडिंग आती है, जो किसी बड़े पास्टर के पास जाती है. उससे जुड़े हुए बाकी पास्टरों के पास ये काम होता है कि वे 10, 20 या 50 अपने बूतेभर पिंड एडॉप्ट कर लें. एडॉप्ट करने का मतलब वे उनपर अपना पूरा जोर लगा दें और ज्यादा से ज्यादा लोगों को अपने धर्म से जोड़ें. पंजाब की बॉर्डर बेल्ट जैसे अमृतसर, तरनतारन, पठानकोट, फिरोजपुर और गुरदासपुर में ऐसा जमकर हो रहा है. वे कमजोर तबके को टारगेट करते हैं. उन्हें स्कूल की फीस, नौकरी, कपड़े और फॉरेन स्टडी का लालच देते हैं. इनको वीजा भी बहुत जल्दी मिल जाता है, जो बाकियों के लिए मुश्किल है. एक को कुछ मिलता है, तो वो दूसरे परिवार को बताता है. ऐसे कड़ी से कड़ी बनती चली जाती है और चुपके से पूरा गांव बदल जाता है. वे दिखेंगे सिख ही, लेकिन घर और दिल के भीतर बदल चुके होंगे. अकेले गुरदासपुर में आज छह से सात सौ घर हैं, जो चर्च बन चुके. डॉ सिंह का दावा चौंकाने वाला है.
वे मानते हैं कि साल 2023 से दो ही सालों के भीतर साढ़े तीन लाख से ज्यादा लोग ईसाई धर्म से जुड़ चुके. अकेले तरनतारन में 10 साल में इस आबादी में 102 फीसदी बढ़ हुई. ये पंथक बेल्ट है.

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