
Buddha Purnima 2024 Date: राजकुमार सिद्धार्थ राजपाट छोड़ कैसे बन गए गौतम बुद्ध? पढ़ें रोचक कथा
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Buddha Purnima 2024: इस साल बुद्ध पूर्णिमा 23 मई दिन गुरुवार को मनाई जाएगी. ऐसी मान्यताएं हैं कि बौद्ध धर्म के संस्थापक गौतम बुद्ध का जन्म इसी तिथि को हुआ था. गौतम बुद्ध को भगवान विष्णु का 9वां अवतार भी माना जाता है.
Buddha Purnima 2024 Date: हर साल वैशाख माह की पूर्णिमा तिथि को बुद्ध पूर्णिमा का त्योहार मनाया जाता है. इस साल बुद्ध पूर्णिमा 23 मई दिन गुरुवार को मनाई जाएगी. ऐसी मान्यताएं हैं कि बौद्ध धर्म के संस्थापक गौतम बुद्ध का जन्म इसी तिथि को हुआ था. गौतम बुद्ध को भगवान विष्णु का 9वां अवतार भी माना जाता है. क्या आप जानते हैं कि महात्मा बुद्ध हमेशा से एक परम संन्यासी नहीं थे, बल्कि उनका जन्म एक अति संपन्न राज परिवार में हुआ था. उन्होंने रातोंरात अपना राजपाट त्यागकर कठोर तप से परम ज्ञान प्राप्त किया था. आइए आज आपको बताते हैं कि आखिर राजकुमार सिद्धार्थ कैसे अपना राजपाट त्यागकर गौतम बुद्ध बने थे.
राजकुमार सिद्धार्थ कैसे बने बुद्ध? भगवान बुद्ध 563 ईसा पूर्व में कपिलवस्तु के पास लुम्बनी नामक जगह पर पैदा हुए थे. माता-पिता ने बचपन में इनका नाम सिद्धार्थ रखा था. एक बार राजकुमार सिद्धार्थ अपने घर से कहीं घूमने के लिए निकले. तभी रास्ते में उन्हें एक वृद्ध, एक रोगी, एक अर्थी और एक संन्यासी को देखा. नगर भ्रमण के दौरान उन्होंने इन सबके बारे में अपने सारथी से पूछा. तब सारथी ने उन्हें बताया कि बुढ़ापा आने पर इंसान रोगी हो जाता है और रोगी होने के बाद मृत्यु को प्राप्त करता है. एक संन्यासी ही है जो मृत्यु के पार जीवन की खोज में निकलता है. यह सुनने के बाद बुद्ध के मन में राजसी सुख छोड़कर वैराग्य धारण करने का ख्याल आया.
गौतम बुद्ध ने 29 वर्ष की उम्र में महल, राजपा छोड़ दिया था और एक संन्यासी के रूप में जीवन बिताने लगे. उन्होंने एक पीपल वृक्ष के नीचे करीब 6 वर्ष तक कठिन तपस्या की. वैशाख पूर्णिमा के दिन ही भगवन बुद्ध को एक वृक्ष के नीचे सत्य ज्ञान की प्राप्ति हुई थी. भगवान बुद्ध को जहां ज्ञान की प्राप्ति हुई वह जगह बाद में बोधगया कहलाई. महात्मा बुध ने अपना पहला उपदेश सारनाथ में दिया था.
महात्मा बुद्ध के विचार संन्यासी जीवन में शरण लेने के बाद महात्मा बुद्ध ने लोगों का मार्गदर्शन किया. उन्होंने अपने उपदेशों में संसार को समझाया कि सिर्फ मांस खाने वाला ही अपवित्र नहीं है, बल्कि क्रोध, व्यभिचार, छल, कपट, ईर्ष्या और दूसरों की निंदा करने वाला अपवित्र है. मन की शुद्धता के लिए इनका त्याग अनिवार्य है. यही वजह है कि हर साल बुद्ध पूर्णिमा या बुद्ध जयंती पर लोग भगवान बुद्ध को याद करते हुए गरीबों और जरूरतमंदों को दान करते हैं.

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