
विज्ञान के क्षेत्र में Harvard की बादशाहत छीन लेगा चीन, दौड़ में भारत कहां खड़ा है?
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हावर्ड के वर्चस्व को चीन से जबदस्त चुनौती मिल रही है. ये सिर्फ रैंकिंग का सवाल नहीं है, बड़ा प्रश्न ये है कि याने वाले समय में साइंस से जुड़े नियम कौन बनाएगा. क्योंकि चीन विज्ञान के क्षेत्र में विशेषज्ञता की मुहल लगाने वाले के तौर पर हार्वर्ड की जगह लेने के लिए खुद को तैयार कर रहा है. इन सबके बीच भारत के सामने के सामने क्या विकल्प हैं - या तो अपनी खुद की अनुसंधान शक्ति को विकसित करना या किसी एक पर आश्रित बने रहना.
दशकों से हावर्ड का विज्ञान जगत में दबदबा रहा है. हार्वर्ड दुनिया के लिए किसी वैज्ञानिक नॉर्थ स्टार से कम नहीं था.एक मार्गदर्शक की तरह हावर्ड ने इस क्षेत्र को गाइड किया है. हावर्ड एक ऐसी जगह है जहां प्रतिष्ठा, पेटेंट, नीति और शक्ति का संगम होता है. यह युग अब धीरे-धीरे समाप्त हो रहा है. सबकुछ बहुत ही शांति से और धीरे-धीरे हुआ है. ऐसा लग रहा है कि विज्ञान में विशेषज्ञता का तमगा अब अमेरिका से चीन शिफ्ट होने वाला है.
चीन रिसर्च आउटपुट , एडवांस मेन्युफेक्चरिंग, एआई, बायोटेक और पेटेंट के कारोबार के मामले में अमेरिका से गैप को तेजी से कम कर रहा है. इसलिए अब सवाल यह नहीं है कि अमेरिकी साइंटिफिक सुप्रीमेसी कमजोर हो रही है या नहीं, लेकिन यह निश्चित रूप से दबाव में है. ऐसे में सवाल यह है कि इसकी जगह क्या लेगा और दुनिया को कितनी जल्दी इसके अनुरूप ढलना पड़ेगा.
दूसरा सबसे अहम सवाल यह है कि क्या भारत इस नए ग्लोबल ऑर्डर के लिए तैयार है? क्योंकि इस नए युग में रिसर्च सुप्रीमेसी एकेडमिक दिखावे भर की बात नहीं, बल्कि ये जिओपॉलिटिकल पॉवर से सीधे जुड़ा है. अगर आप यह देखना चाहते हैं कि विज्ञान पर शीत युद्ध जमीनी हकीकत में कैसा दिखता है, तो इसके लिए आपको पेंटागन की ब्रीफिंग की जरूरत नहीं है. बस हावर्ड के दाखिले के आंकड़े देख लीजिए.
आंकड़े क्या कहते हैं पूरे अमेरिका में अंतरराष्ट्रीय छात्रों के मामले में भारत अब सबसे आगे है. ओपन डोर्स 2025 की रिपोर्ट के मुताबिक 2024-25 में अमेरिका में 3 लाख 63 हजार से ज्यादा भारतीय छात्र पढ़ रहे हैं. इस मामले में भारत पहले और चीन दूसरे नंबर पर है, जहां से करीब 2 लाख 65 हजार छात्र अमेरिका पहुंचे हैं.
लेकिन जब नजर अमेरिका के सबसे चुनिंदा और प्रतिष्ठित संस्थानों पर जाती है—वहीं, जहां से ग्लोबल रिसर्च सिस्टम को ताकत मिलती है—तो तस्वीर पलट जाती है.हार्वर्ड के फॉल 2025 के आंकड़े बताते हैं कि वहां चीन से 1,452 छात्र हैं, जबकि भारत से सिर्फ 545. यह फर्क कोई मामूली संयोग नहीं है, बल्कि एक गंभीर संकेत है.
यह अंतर एक सामान्य जिज्ञासा नहीं है, बल्कि एक महत्वपूर्ण संकेत है. एक बात जो आपको असहज कर सकती है. हां, यह सच है कि भारत वॉल्यूम के मामले में आगे है, लेकिन प्लेसमेंट के मामले में चीन आगे हैं. चीन के स्टूडेंट उन अनुसंधान-प्रधान केंद्रों में जा रहे हैं, जो यह तय करते हैं कि भविष्य का मालिक कौन होगा. यह ऐसी दुनिया है जहां प्रयोगशालाएं शक्ति का प्रतीक हैं. उन जगहों पर प्लेसमेंट होना एक आंकड़ा नहीं बल्कि एक रणनीति है.

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