
हिंदुओं का दिल जीतने के लिए होली खेलते थे ये अंग्रेज़ अफ़सर
BBC
जब मुग़लिया सल्तनत अपनी आख़िरी सांसें ले रही थी और देश पर ब्रिटिश हुकूमत का दायरा बढ़ रहा था, तो अंग्रेज़ साहब बहादुर अपनी रियाया के साथ होली की महफ़िलें भी सजाया करते थे.
(ये कहानी बीबीसी हिन्दी पर 13 मार्च 2025 को प्रकाशित हो चुकी है)
रंगों का त्योहार होली, सदियों से मनाया जाता रहा है. जब मुग़लिया सल्तनत अपनी आख़िरी सांसें ले रही थी और देश पर ब्रिटिश हुकूमत का दायरा बढ़ रहा था, तो अंग्रेज़ साहब बहादुर अपनी रियाया (प्रजा) के साथ होली की महफ़िलें भी सजाया करते थे.
दिल्ली में कंपनी बहादुर के आला अफ़सर सर थॉमस मेटकाफ़ भी होली खेलते थे. इस बात पर आज शायद ही कोई यक़ीन करे. आख़िर सर थॉमस मेटकाफ़ कोई मामूली हस्ती तो थे नहीं. वो हिंदुस्तान में कंपनी सरकार के बड़े अफ़सर थे. ब्रिटिश सामंती ख़ानदान से ताल्लुक़ रखते थे. मुग़लों के दरबार में ईस्ट इंडिया कंपनी के नुमाइंदे थे.
ऐसे में कोई उनके होली खेलने के दावे करे, तो यक़ीन करना मुश्किल तो होगा ही.
लेकिन, मरहूम मिसेज़ एवरेट की क़िस्सागोई पर भरोसा करें, तो सर थॉमस मेटकाफ़ को रंगों के त्योहार से परहेज़ न था. बस, उनका हुक्म ये था कि घर के भीतर रंग का हुड़दंग न हो. आख़िर उनकी हवेली के मेहमानख़ाने में उनके हीरो नेपोलियन के बुत लगे हुए थे और सर मेटकाफ़ उन बुतों पर रंगों की बेतकल्लुफ़ बूंदें हरगिज़ नहीं पड़ने देना चाहते थे.
इस बात का कोई ज़िक्र नहीं मिलता कि सर मेटकाफ़ ने बसंत के साथ ही आने वाले रंगों के महीने फागुन का ख़ैरमकदम (स्वागत) किया हो. लेकिन, नानी-दादी के क़िस्से ये बताते हैं कि दिल्ली के हिंदुओं का दिल जीतने के लिए सर मेटकाफ़ होली खेला करते थे. दरअसल, सर मेटकाफ़ ऐसा इसलिए करते थे ताकि मुग़लों की संस्कृति के प्रति अपने झुकाव और हिंदुओं के बीच संतुलन बना सकें.
मुग़ल कला-संस्कृति के प्रति सर मेटकाफ़ का लगाव इस क़दर था कि भयंकर लू वाली गर्मियों में भी वह मुहम्मद क़ुली ख़ां के मकबरे को तब्दील कर के बनाए गए घर में दिन गुज़ारते थे. हालांकि, क़ुली खां के मकबरे में रिहाइश बनाने से पहले सर थॉमस मेटकाफ़ सर्दियों के दिन मेटकाफ़ हाउस में बिताते थे. स्थानीय लोग इसे मटका कोठी कहते थे.













