
सावन और नवरात्रि में नॉनवेज बैन... जानें- क्या कहता है विज्ञान, भूगोल और धर्म?
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नवरात्रि के दौरान मांसाहार को लेकर चल रही बहस में धार्मिक, सांस्कृतिक और आयुर्वेदिक कारण शामिल हैं. बंगाल में मछली को पूजा का हिस्सा माना जाता है जबकि बिहार-झारखंड में मांसाहार का विरोध अधिक है. आयुर्वेद के अनुसार वर्षा ऋतु में मांसाहार से स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है.
पहले सावन और फिर नवरात्रि आते ही एक जैसी बहस शुरू हो जाती है, यह बहस सीधे तौर पर खान-पान पर असर डालती है और यह तय करने लगती है कि किसी को कब और क्या खाना चाहिए. इस चर्चा का मुख्य विषय मांसाहार यानी नॉनवेज फूड रहता है.
नवरात्रि शुरू होने के साथ ही यह बहस फिर से जोर पकड़ चुकी है. पर्व-त्योहार के समय मांसाहार पर रोक, बिक्री का विरोध और बाजार बंदी जैसे अभियान फिर शुरू हो चुके हैं. सवाल है कि क्या वाकई नवरात्र में मांसाहार नहीं करना चाहिए? इसके साथ ही दूसरा तर्क भी आ जाता है कि दुर्गा पूजा का चलन जिस बंगाल से निकला है, वहां तो मछली खाना शुभ माना जाता है. बिहार-झारखंड के कई दुर्गा मंदिर में तो बलि भी चढ़ती है और इस बलि के मांस को प्रसाद के तौर पर बांटा भी जाता है.
फिर आखिर ये रोक की बात क्यों?
इस बाबत इंडिया टुडे की एक रिपोर्ट में इतिहासकार नृसिंह प्रसाद भादुड़ी कहते हैं कि खान-पान और त्योहार की परंपरा पर भौगोलिक परिस्थितियों का असर और उनका वर्चस्व हमेशा से रहा है. इसमें कोई आश्चर्य वाली बात नहीं है. पश्चिम बंगाल ऐसा राज्य है जिसकी संस्कृति का निर्माण बंगाल की खाड़ी, हुगली, पद्मा, मेघना और गंगा नदी करती हैं. नदी जल की प्रचुरता, मीठे पानी में आसानी से मिल जाने वाली मछली की उपलब्धता और इस राज्य की इकोनॉमी का बड़ा हिस्सा होने के कारण मछली, यहां की थाली में आसानी से मिलती है और पूजा-परंपरा से भी इसीलिए इसका ताल्लुक बहुत गहरा देखने को मिलता है.
ऐसे में बंगालियों की मछली पर निर्भरता कोई बड़ी बात नहीं है. यह आसानी से उनकी खान-पान की संस्कृति का हिस्सा बन जाती है. यही वजह है कि दुर्गा पांडालों में हिल्सा मछली प्रसाद के रूप में भी मिल जाती है और पूजा के बाद होने वाले भंडारे में भी.

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