
श्रीलंका जैसे ही ये 7 देश भी हो गए थे तबाह, जानिए इन डिफॉल्टर मुल्कों के लोगों के सामने क्या-क्या संकट आए
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श्रीलंका में आर्थिक दिवालियापन के हालात ने भारत के इस पड़ोसी देश को हिंसा की आग में झोंक दिया है. आटा-दूध जैसे जरूरी सामानों की कीमत हजारों-हजार में पहुंच गई है. चारों ओर लूटपाट-आगजनी हो रही है. लोग सड़कों पर हैं. ऐसी स्थिति सिर्फ श्रीलंका में ही नहीं इससे पहले कई और देशों में भी आ चुकी है जब इकोनॉमी के दिवालिया होने के कारण जनता में हाहाकार मच चुका है.
आसमान छूती महंगाई, अनाज-दूध जैसी जरूरी सामानों की किल्लत, दुकानों पर लंबी-लंबी लाइनें, डिपार्टमेंटल स्टोर्स पर लूटपाट, राजनीतिक लड़ाई-हिंसा, सरकार विरोधी प्रदर्शन और शहर-शहर दंगों की आग में झुलस रहे पड़ोसी देश श्रीलंका के हालात ने दुनियाभर के लोगों को चिंता में डाल दिया है. गलत आर्थिक फैसलों, सस्ते ब्याज, मुफ्त की स्कीमों और 50 बिलियन डॉलर के विदेशी कर्ज के जाल में फंसा श्रीलंका दिवालिया होने की कगार पर है. इस संकट की स्थिति में जनता की उम्मीदें खत्म हो रही हैं. लोग सरकार के खिलाफ सड़कों पर हैं. प्रधानमंत्री का इस्तीफा हो चुका है. सांसदों-मंत्रियों और शहरों के मेयर्स के घरों पर लगातार हमले हो रहे हैं. जगह-जगह हिंसक भीड़ पर सेना गोलीबारी कर रही है. 1948 में आजाद हुए श्रीलंका के सामने इस तरह का संकट पहली बार सामने आया है.
कैसे श्रीलंका संकट में फंसा? पिछले दो साल से जारी कोरोना संकट के बीच लगातार बढ़ते विदेशी कर्ज और 2019 में चुनावी वादा निभाने के लिए टैक्स घटाने के राजपक्षे सरकार के फैसले ने श्रीलंका को इस संकट की ओर ढकेल दिया. आटा-दूध-दवाइयों की कीमतें हजारों-हजार तक पहुंच चुकी हैं. इतनी कीमत के बावजूद भी सामान मिलना जब मुश्किल हो गया तो लोग हिंसा पर उतर आए. डिपार्टमेंटल स्टोर्स-मॉल्स और दुकानों में लूट का सिलसिला शुरू हो गया. लगातार जरूरी सामानों की कीमतें बढ़ती गईं, कर्ज भी बढ़ता गया और फिर श्रीलंका और वहां के लोग इस हालात में फंस गए कि न तो जरूरी सामान की कीमतें पूरी हो पाईं न ही विदेशी कर्ज को बढ़ने से रोकने का कोई उपाय दिखा. 12-12 घंटे बिजली कटौती होने लगी. इंफ्लेशन 17 फीसदी से ऊपर पहुंच गया. बाहर से आयात करने के लिए फॉरेन करेंसी खत्म हो गया और निवेशक-पर्यटक देश से दूर होने लगे.
इस संकट ने लोगों को वेनेजुएला और ग्रीस के दिवालिया संकट की याद दिला दी है जब एकदम से इन देशों का सिस्टम फेल हो गया और जनता को अराजकता के हालात का सामना करना पड़ा. करेंसी की वैल्यू एकदम से जीरो हो गई और लोगों के घरों में रखे पैसे कागज के ढेर बन गए. एक-एक किलो अनाज के लिए लोगों को हजारों-लाखों रुपये चुकाने पड़े और लोग एकदम से बेहाल हो गए. केवल यही देश नहीं इतिहास को अगर टटोलें तो एक समय ऐसा भी था जब अमेरिका-रूस जैसे देशों को भी अतीत में दिवालियापन के हालात का सामना करना पड़ा था और रातोरात लोगों को संकटों का सामना करना पड़ा.
1. वेनेजुएला में जब नोट हो गए कबाड़! वेनेजुएला में 2017 में शुरू हुए आर्थिक संकट ने देश को दिलाविया घोषित करा दिया. विदेशी कर्ज और गलत आर्थिक नीतियों ने करेंसी का हाल इतना बुरा कर दिया कि सरकार को 10 लाख बोलिवर का नोट तक छापना पड़ा. करेंसी की वैल्यू इतनी खराब हुई कि एक-एक कप कॉफी के लिए लोगों को 25-25 लाख बोलिवर तक की कीमत चुकानी पड़ी. 500 किलोग्राम बोनलेस चिकन की कीमत 2.94 डॉलर, 12 अंडों के लिए 2.93 डॉलर तक लोगों को चुकाना पड़ा. भारत से अगर तुलना करें तो 12 अंडों के लिए आपको 1.08 डॉलर खर्च करने पड़ते हैं. एक किलोग्राम टमाटर के लिए 1.40 डॉलर तक लोगों को चुकाने पड़े. लोगों को दूध-आटा जैसे सामानों के लिए बोरे में भर भरकर नोट चुकाने पड़े.
2. अर्जेंटीना जब अचानक हो गया कंगाल साल 2020 के जुलाई महीने में अचानक दक्षिण अमेरिकी देश अर्जेंटीना कंगाली की कगार पर पहुंच गया. विदेशी निवेशक अपने निवेश के बॉन्ड के 1.3 बिलियन डॉलर पूरे वापस मांगने लगे. बैंकों और वित्तीय संस्थाओं ने इस कर्ज को वापस करने से साफ हाथ खड़े कर दिए. अर्जेंटीना ने खुद के इस हालात के लिए अमेरिका को दोषी ठहरा दिया. लोगों के लिए महंगाई का सामना करना मुश्किल हो गया. साल 2001-02 में भी अर्जेंटीना दिवालियापन के हालात से जूझ चुका था. जैसे-तैसे इकोनॉमी के हालात संभले थे कि फिर स्थिति बिगड़ जाने से आम जनता के लिए रोजमर्रा के सामानों की महंगाई को झेलना मुश्किल हो गया.
3. 2012 के ग्रीस संकट ने जब लोगों को भुखमरी की कगार पर पहुंचा दिया पिछले दशक में इस दुनिया ने रातोरात ग्रीस को दिवालिया होते देखा. 2001 में अपनी करेंसी की जगह यूरो को अपनाने के बाद से ग्रीस की इकोनॉमी लगातार संकट में फंसती चली गई. सरकारी कर्मचारियों के वेतन बढ़ने और लगातार बढ़ते सरकारी खर्च ने 2004 आते-आते सरकारी खजाने को भारी कर्ज में डूबा दिया. 2004 के एथेंस ओलंपिक के आयोजन के लिए किए गए 9 बिलियन यूरो के खर्च ने सरकार को महासंकट में फंसा दिया.

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