
डेनमार्क से आजादी के लिए क्या ग्रीनलैंड अमेरिका से हाथ मिला लेगा, क्यों यह दांव खतरनाक हो सकता है?
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ग्रीनलैंड में आजादी की मांग दशकों से चल रही है. फिलहाल यह द्वीप देश डेनमार्क के अधीन अर्ध स्वायत्त तरीके से काम करता है. मतलब घरेलू मामलों को ग्रीनलैंडर्स देखते हैं, लेकिन फॉरेन पॉलिसी और रक्षा विभाग डेनमार्क सरकार के पास हैं. अब कयास लग रहे हैं कि डोनाल्ड ट्रंप की ग्रीनलैंड पर कब्जे की जिद के बीच वहां अलगाववाद को और हवा मिलेगी.
ठीक सालभर पहले डोनाल्ड ट्रंप ने दोबारा राष्ट्रपति पद संभाला. ये बदलाव अमेरिका में था, लेकिन असर दूरदराज के देश ग्रीनलैंड पर दिखने लगा. डेनमार्क के अधीन काम करते देश में आजादी की मांग जोर पकड़ने लगी. महज पचपन हजार आबादी वाले इस बर्फीले मुल्क में कई संगठन बने हुए हैं, जो स्वतंत्र ग्रीनलैंड चाहते हैं. लेकिन इसका अमेरिका से क्या संबंध है?
ट्रंप प्रशासन पर आरोप लग रहे हैं कि उनकी वजह से ग्रीनलैंड में सेपरेटिस्ट मूवमेंट बढ़ी. लेकिन ट्रंप को तो ग्रीनलैंड चाहिए, फिर वे उसे स्वतंत्रता के लिए क्यों उकसाएंगे! इसे समझने के लिए एक बार रूस का उदाहरण लेते हैं.
साल 2014 में मॉ़स्को ने यूक्रेन के क्रीमिया पर कब्जा कर लिया. साथ ही करीबी इलाके जैसे डोनबास के डोनेट्स्क और लुहान्स्क में एक मुहिम छेड़ दी. अलग होकर आजाद देश बनाने की. असल में दोनों ही रूसी भाषा बोलने वाले क्षेत्र हैं. सोवियत संघ के बंटवारे के बाद कीव का हिस्सा बनने के बाद भी वे मॉस्को से दूरी नहीं बना पा रहे थे. इसी का फायदा उठाया पुतिन प्रशासन ने. उन्होंने भड़काना शुरू कर दिया कि यूक्रेन के साथ उनके अधिकार खतरे में हैं.
डोनबास में कई सेपरेटिस्ट गुट बन गए, जो यूक्रेन से अलग होना चाहते थे. रूस ने इन गुटों को हथियार, ट्रेनिंग और राजनीतिक समर्थन दिया, हालांकि लंबे समय तक उसने सीधे दखल से इनकार किया. बाद में फरवरी 2022 में रूस ने इन्हीं इलाकों को बचाने के नाम पर यूक्रेन पर हमला किया. जंग अगर पुतिन की शर्तों पर खत्म हो तो डोनबास रूस के साथ शामिल हो जाएगा, जबकि पहली मांग आजादी की थी.
यही तरीका डेनमार्क-ग्रीनलैंड-अमेरिका के लव-ट्राएंगल पर काम कर सकता है. आधिकारिक तौर पर अमेरिका यह नहीं कहता कि वह ग्रीनलैंड में आजादी या अलगाववाद की मुहिम चला रहा है. लेकिन हाल के सालों में कुछ ऐसे संकेत और बयान सामने आए, जिनकी वजह से यह सवाल उठने लगा.

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