
अमेरिकी दादागिरी के खात्मे के बाद कैसी होगी नई दुनिया? कनाडाई पीएम क्या इशारा कर रहे
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कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी के दावोस भाषण ने उस धारणा को तोड़ दिया कि वेस्टर्न ऑर्डर निष्पक्ष और नियमों पर चलने वाली है. कार्नी ने साफ इशारा किया कि अमेरिका अब वैश्विक व्यवस्था को संभालने वाली नहीं, बल्कि उसे बिगाड़ने वाली ताकत बन चुका है. ट्रंप के टैरिफ, धमकियों और दबाव की राजनीति के बीच मझोले देशों को उन्होंने सीधा संदेश दिया है- खुद को बदलो, नहीं तो बर्बाद हो जाओगे.
मंगलवार को दावोस में कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी का भाषण आने वाले वक्त में ग्लोबल डिप्लोमेसी का एक अहम मोड़ माना जाएगा. इसे उस ऐतिहासिक पल के तौर पर देखा जाएगा, जब जी-7 के किसी नेता ने पहली बार खुले मंच से वेस्टर्न ऑर्डर की हिपोक्रेसी पर सवाल उठा दिए.
कार्नी के भाषण पर खूब तालियां बजीं जिसमें अमेरिका की असहज चुप्पी भी दिखी. असल में कार्नी ने वही बात सार्वजनिक तौर पर कह दी, जो दुनिया के नेता अमेरिका की 'डायनासोर डिप्लोमेसी' के उभार के बाद से बंद कमरों में कहते आ रहे थे.
कार्नी ने अमेरिका के पाखंड का पर्दाफाश ऐसे समय में किया है जब राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप दोस्त-दुश्मन का फर्क किए बिना सबके साथ सख्त और धमकी भरा रवैया अपना रहे हैं.
दुनियाभर पर टैरिफ लगाने के बाद ट्रंप अब ग्रीनलैंड पर कब्जे की बातें कर रहे हैं. वो इस रास्ते में आने वालों को सजा देने की धमकी दे रहे हैं, यहां तक कि फ्रांस जैसे नाटो सहयोगियों को भी धमका चुके हैं.
कनाडा भी इससे अछूता नहीं रहा. ट्रंप ने कनाडा को '51वां राज्य' बनाने की बात कही, कनाडाई सामान पर 25 फीसदी टैरिफ की धमकी दी और यह जताया कि कनाडा की संप्रभुता पर भी सौदेबाजी की जा सकती है. जो देश सात दशक तक अमेरिका का सबसे भरोसेमंद साथी रहा, उसके लिए ट्रंप का यह रवैया महज धमकी नहीं बल्कि अपमान भी है.
ऐसे में दावोस से बेहतर मंच और क्या हो सकता था, यह बताने के लिए कि अमेरिका के साथ वफादारी निभाने का अब कोई फायदा नहीं रहा.

वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम (WEF) के दावोस शिखर सम्मेलन में मंगलवार को यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने इसके संकेत दिए. उन्होंने दावोस शिखर सम्मेलन में कहा कि कुछ लोग इसे ‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ कहते हैं, ऐसा समझौता जो 2 अरब लोगों का बाजार बनाएगा और वैश्विक GDP के करीब एक-चौथाई का प्रतिनिधित्व करेगा.

मिडिल ईस्ट क्षेत्र में अमेरिकी फौजी जमावड़े ने स्थिति को काफी संवेदनशील बना दिया है. एयरक्राफ्ट कैरियर, फाइटर जेट्स और मिसाइल डिफेंस सिस्टम अलर्ट मोड पर हैं. इसी बीच सोशल मीडिया पर दावा किया गया है कि चीन ने ईरान को अब तक की सबसे बड़ी सैन्य मदद भेजी है, जिसमें 56 घंटे के भीतर चीन के 16 जहाज ईरान पहुंचे. हालांकि इस सूचना की पुष्टि नहीं हुई है.

ईरान की राजधानी तेहरान में होने वाले विरोध प्रदर्शनों ने हालात को काफी गंभीर बना दिया है. जनता और सत्ता पक्ष के बीच भारी तनाव है जबकि अमेरिका भी लगातार दबाव बढ़ा रहा है. ईरान के सर्वोच्च नेता खामेनेई ने अमेरिकी राष्ट्रपति पर तगड़ा हमला किया है. वहीं, अरब सागर की ओर अमेरिकी युद्धपोत की मौजूदगी से क्षेत्र में तनाव और बढ़ गया है.

मिडिल ईस्ट में अमेरिका के बढ़ते सैन्य दबाव के बीच सोशल मीडिया पर यह दावा किया जा रहा है कि चीन ने ईरान को अब तक का सबसे बड़ा मिलिट्री एयरलिफ्ट भेजा है. 56 घंटों के भीतर चीन के 16 Y-20 मिलिट्री ट्रांसपोर्ट विमान ईरान पहुंचे. इसके अलावा HQ-9B एयर डिफेंस मिसाइल प्रणाली मिलने की भी चर्चा है जो लंबी दूरी तक दुश्मन के फाइटर जेट्स और मिसाइलों को मार गिराने में सक्षम मानी जाती है. ऐसे में क्या क्या खुलकर ईरान के समर्थन में उतर गया बीजिंग?

स्विट्ज़रलैंड के दावोस में वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम से पहले पाकिस्तान पर दबाव और विरोध का स्तर बढ़ गया है. पश्तून तहफ्फुज मूवमेंट (PTM) और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने स्थानीय सड़कों पर पाकिस्तान के खिलाफ नारे लगाए, जिनमें पाकिस्तानी सेना और प्रधानमंत्री पर गंभीर आरोप लगे. वे आरोप लगाते हैं कि सेना जबरन गायब करने, फर्जी मुठभेड़ों में हत्याओं और खनिज संसाधनों की लूट में शामिल है.








