
संवेदनशील डेटा को बचाने के लिए भारत-UAE में इतना भरोसा क्यों, डिजिटल एंबेसी की क्या भूमिका?
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जल्द ही भारत और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के बीच एक समझौता हो सकता है. दोनों ही देश एक-दूसरे के यहां डिजिटल एंबेसी खोलेंगे. यह आम दूतावास से बिल्कुल अलग होगा, जहां खुफिया कागजात से लेकर सरकारी बैंकों के भी दस्तावेज रखे जा सकते हैं.
देश एक-दूसरे के यहां एंबेसी खोलते हैं ताकि कूटनीतिक बातचीत आसान हो सके. यहां डिप्लोमेट्स होते हैं, जो नेताओं से पहले मेलजोल करते हुए कई मुश्किल मामले सुलझाते हैं. लेकिन अब देश आपस में डिजिटल एंबेसी भी खोल रहे हैं. 19 जनवरी को संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) और भारत ऐसी ही चर्चा पर आगे बढ़े. अब हमारी डिजिटल एंबेसी यूएई में हो सकती है, जहां राष्ट्रीय महत्व के दस्तावेज रखे जाएंगे. वहीं यूएई भी हमारे यहां अपना डिजिटल डेटा रखेगा.
दो रोज पहले यूएई के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान भारत आए. यहां उन्होंने पीएम नरेंद्र मोदी के साथ कई समझौतों पर हस्ताक्षर किए. इसी के तहत दोनों देशों में डिजिटल एंबेसी खोलने की भी चर्चा है. ये डेटा सेंटर कहां हो सकता है और क्या-क्या तैयारियां चाहिए, इसे खंगाला जा रहा है.
यूएई के साथ कैसे हैं रिश्ते यूएई पश्चिम एशिया का बड़ा डिजिटल और डेटा हब बन चुका है, जहां मॉडर्न डेटा सेंटर और साइबर सुरक्षा के मजबूत इंतजाम हैं. दूसरी वजह यह है कि भारत और यूएई के रिश्ते सिर्फ व्यापार तक सीमित नहीं, बल्कि ज्यादा मजबूत हो चुके हैं. ऐसे में संवेदनशील डेटा को लेकर भरोसे का स्तर भी बढ़ा-चढ़ा है. साथ ही इस देश में राजनीतिक स्थिरता भी है. यही वजहें यूएई को भी भारत में दिखती हैं.
डिजिटल एंबेसी को इंफो या डेटा एंबेसी भी कह सकते हैं, जिसका मतलब है किसी देश का अपना जरूरी सरकारी डेटा और डिजिटल सिस्टम किसी भरोसेमंद देश में सुरक्षित रखना. पारंपरिक एंबेसी में इमारत, दफ्तर और कर्मचारी होते हैं, वैसे ही डिजिटल एंबेसी में सर्वर, डेटा सेंटर और क्लाउड सिस्टम होते हैं. फर्क सिर्फ इतना है कि यह सब ऑनलाइन और डिजिटल रूप में होता है.
डिजिटल एंबेसी की जरूरत तब महसूस की गई जब सरकारों का कामकाज तेजी से डिजिटल होने लगा और साइबर हमलों का खतरा बढ़ गया. खास तौर पर साल 2007 में यूरोपीय देश एस्टोनिया पर हुए साइबर हमले के बाद यह चिंता गहराई. अटैक में सरकारी वेबसाइट्स, बैंकिंग सिस्टम और संचार सेवाएं ठप हो गई थीं.
दरअसल उस वक्त एस्टोनिया दुनिया के सबसे ज्यादा डिजिटली विकसित देशों में से था. साइबर हमले के दौरान सरकारी वेबसाइटें, संसद, मंत्रालय, बैंक और मीडिया पोर्टल्स बार-बार ठप हो रहे थे. लोगों को ऑनलाइन बैंकिंग, टैक्स भरने और सरकारी सेवाएं लेने में दिक्कतें आईं.

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