
ट्रंप के 'गाजा पीस बोर्ड' पर महाशक्तियों में रार! फ्रांस और स्वीडन ने दिखाया ठेंगा, पुतिन के 'मौन' ने बढ़ाई बेचैनी
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ट्रंप के प्रस्ताव को कुछ देशों का समर्थन भी मिला है. इज़राइल, सऊदी अरब, यूएई, मिस्र, तुर्की और हंगरी समेत करीब 35 देशों ने बोर्ड से जुड़ने की सहमति दे दी है. विवादों के बीच यह बोर्ड अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में एक नए शक्ति संतुलन की बहस को जन्म दे रहा है.
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की महत्वाकांक्षी पहल 'बोर्ड ऑफ पीस' (Board of Peace) को लेकर वैश्विक कूटनीति में बड़ी दरार नजर आ रही है. गाजा युद्ध और वैश्विक संघर्षों को सुलझाने के नाम पर बनाए जा रहे इस बोर्ड में शामिल होने के लिए ट्रंप ने करीब 50 राष्ट्राध्यक्षों को आमंत्रित किया है, लेकिन प्रतिक्रियाएं बेहद चौंकाने वाली हैं.
जहां इजरायल और सऊदी अरब जैसे करीब 35 देशों ने इसके लिए सहमति दे दी है, वहीं अमेरिका के कई पारंपरिक सहयोगियों ने इससे दूरी बना ली है. रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने फिलहाल इस बोर्ड का हिस्सा बनने पर कोई जवाब नहीं दिया है.
जानकारों का मानना है कि रूस और चीन (जो खुद यूएन सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य हैं) ऐसी किसी भी पहल को लेकर बेहद सतर्क हैं जो संयुक्त राष्ट्र (UN) के प्रभुत्व को कम करती हो. हालांकि, ट्रंप और पुतिन के बीच हालिया समय में नजदीकियां बढ़ी हैं, लेकिन बोर्ड की सदस्यता को लेकर मॉस्को ने अभी पत्ते नहीं खोले हैं.
यूरोपीय देशों की दो टूक नॉर्वे और स्वीडन जैसे देशों ने स्पष्ट रूप से ट्रंप के इस बोर्ड में शामिल होने से इनकार कर दिया है. फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों के करीबी सूत्रों का कहना है कि वे इस न्योते को स्वीकार नहीं करेंगे. इससे नाराज होकर ट्रंप ने फ्रांसीसी वाइन और शैंपेन पर 200% टैरिफ लगाने की धमकी तक दे दी है.
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इटली ने भी संवैधानिक अड़चनों का हवाला देते हुए इसे 'समस्यात्मक' बताया है. जर्मनी के चांसलर फ्रेडरिक मर्ज़ ने भी दावोस में इसके हस्ताक्षर समारोह में शामिल होने से मना कर दिया है.कनाडा ने सैद्धांतिक सहमति जरूर दी है, लेकिन शर्तों पर बातचीत जारी है. वहीं ब्रिटेन, जर्मनी और जापान ने अब तक कोई स्पष्ट रुख नहीं अपनाया है.

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