
'ये पसंद आ गई है, हम इसे लेकर जाएंगे', मेहंदीपुर पहुंची 'प्रेत-पीड़ितों' की आपबीती
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राजस्थान के दौसा जिले में स्थित मेहंदीपुर बालाजी मंदिर में हर रोज सैकड़ों, हजारों लोग हाजिरी लगाने आते हैं. कहते हैं कि यहां जादू-टोना, तंत्र-मंत्र, भूत-प्रेत जैसी बाधाओं का निवारण होता है. लोगों को भरोसा है कि यहां बालाजी महाराज के सामने अर्जी लगाने से ही उनका कल्याण होगा.
'रात-बेरात बीवी अचानक गहरी नींद से उठकर चीखने लगती है. मर्दों की तरह भारी आवाज में बात करती है. कभी जोरों से ठहाके लगाती है, कभी आंसुओं के साथ शोक मनाती है. दांत पीसते हुए जब सिर झटकती है तो सदमे से दिल कांप जाता है. चेहरे पर बिखरे बाल, सुर्ख लाल आंखें देख मन में दहशत बैठ जाती है.' 'दो बच्चे हैं मेरे. छोटे-छोटे. अपनी मां का ऐसा हाल देखकर घबरा जाते हैं. उससे दूर भागते हैं. इन मासूमों को अच्छे-बुरे की समझ ही क्या है. न जाने बच्चों के नसीब में ऐसी कितनी भयानक रातें और लिखी हैं.' कहते-कहते पवन की आंखों में आंसू उतर आए. ये कहानी इकलौते पवन की नहीं है, बल्कि राजस्थान के दौसा जिले में स्थित मेहंदीपुर बालाजी मंदिर में हाजिरी लगाने वाले सैकड़ों, हजारों लोगों की है. वो लोग, जिनका जादू-टोना, तंत्र-मंत्र, भूत-प्रेत जैसे चक्करों में सब उजड़ गया. पर भरोसा है कि बालाजी के सामने अर्जी लगाने से ही उनका कल्याण होगा. तभी तो हर रोज फरियादी दूर-दूर से अपना दर्द लेकर यहां आते हैं. यहां हर इंसान की अपनी कहानी, अपनी पीड़ा है. कोई पत्नी के सिर प्रेत आने की बात कहता है तो किसी की बहन पर बुरी आत्माओं का साया है. विज्ञान के नजरिए से इनके दर्द को समझना मुश्किल है. लेकिन दर्द एक भावनात्मक अनुभूति है. जो देखने से पता नहीं चलती. हमने यहां पवन जैसे और भी कई दुखी लोगों, परिवारों से बात की और उनके अंदर छिपी व्यथा को समझने का प्रयास किया.
रामसिया गोरखपुर से आए और यहीं रह गए सुबह करीब 11 बजे बालाजी के मुख्य भवन से थोड़ी दूर ठेले पर खीरे बेचते दिखे 40 साल के रामसिया. दुबला-पतला शरीर. रामसिया करीब 8-9 महीने पहले गोरखपुर से यहां आए थे. अब एक मजबूरी ने उन्हें यहां बांधकर रखा है. वो कहते हैं 'एक संकट मुझे यहां खींच लाया. मुझ पर प्रेत का साया है. भयंकर सपने आते हैं. आत्माएं दिखाई देती हैं. लड़ाई-झगड़े होते हैं. ऊपरी हवा ने सब तबाह कर दिया. यहां हूं तो राहत है, जिंदा हूं. चला जाऊंगा तो न जाने क्या होगा.' इतना कहकर रामसिया ने लंबी सांस भरी. कैसे पता चला कि आप पर प्रेत का साया है? 'हमने जांच कराई थी, पंडित से. पता चला एक दुश्मन ने मुझ पर प्रेत छोड़ रखा है. तबसे सेहत एकदम खराब रहती है. सिर भारी रहता है. दवाई-गोली का भी असर नहीं होता. अब तो बालाजी के हाथ में है सब.' इलाज कराने आए थे, फिर ठेला लगाना क्यों शुरू कर दिया? 'क्या करें मजबूरी है, साहब. बालाजी में इलाज के पैसे नहीं लगते. पर रहने और खाने का तो बंदोबस्त करना ही पड़ता है. इसलिए पेट भरने के लिए ठेला लगाते हैं. इसी से गुजारा चलता है.' क्या बालाजी में दर्शन और पूजा-पाठ से कुछ फायदा हुआ है? बिल्कुल! पहले से स्थिति बहुत बदली है. इसलिए अब घर वापस जाने की सोचता हूं. फिर साल में एकाध बार दर्शन को आऊंगा. ये पहला मौका था जब रामसिया के चेहरे पर मुस्कान और घर वापस लौटने की उम्मीद दिखाई दी. आगे बोले, 'घरवालों की बहुत याद आती है. तीन छोटे बच्चे हैं. उनका भी ख्याल आता है.' मेहंदीपुर बालाजी धाम में तीन प्रमुख देवता विराजते हैं. एक तो स्वयं बालाजी महाराज, जिनके बारे में माना जाता है कि वे यहां जागृत अवस्था में विराजमान हैं. दूसरे प्रेतराज और तीसरे भैरोनाथ. जिनका पहाड़ पर बसेरा है. हरियाणा की 17 साल की युवती इसी पहाड़ पर हमें एक परिवार मिला जो अपनी 17 साल की बेटी को लाया था. बच्ची के चेहरे पर मासूमियत के रंग बिखरे थे. आंखें ऐसी जैसे महीनों से नींद के इंतजार में जगी हों. बेटी 11वीं क्लास में पढ़ती है. बच्ची की मां ने बताया- '3-4 महीने से कुछ ठीक नहीं रहती है. बहुत सुस्त हो गई है. डॉक्टर कहते हैं ठीक हो जाएगी. पर दवाओं का तो कोई असर ही नहीं है. इसलिए यहां लाए हैं.' दरबार की तरफ देखते हुए कहा. इनके आगे एक शब्द नहीं बोलीं. बेटी की तकलीफ कहीं जग हंसाई का मंच न बन जाए. इस डर से थोड़ा बहुत कहकर खामोश हो गईं. करीब 50 की उम्र के परिवार के एक सदस्य ने बताया कि लोग यहां ऊपरी चक्कर, वशीकरण, जादू-टोना जैसी समस्त समस्याओं के निवारण के लिए दूर-दूर से आते हैं. सिरदर्द, कंधे भारी, आंखों में जलन कुछ ऐसे लक्षण हैं, जिनसे ऊपरी हवा का अंदाजा हो जाता है. दूसरा, जब दवाएं बेअसर होने लगे तो समझ आ जाता है कि ये प्रेत-पिशाच का चक्कर है.
कानपुर की उर्मिला कानपुर से आई 50 साल की उर्मिला ने बताया कि वो करीब 20 साल से यहां आ रही हैं, पति के साथ. 'गंदे-गंदे सपने आते थे. तबीयत एकदम खराब रहती थी. सिर पे शैतान का साया था. यहां आने लगे तो आराम पड़ा. तबसे साल में एक-दो बार दर्शन को आते हैं. अब एकदम ठीक हूं.' तबीयत खराब होने पर कैसे लक्षण रहते थे, क्या डॉक्टर को दिखाया? 'हां, पहले तबीयत बिगड़ते ही डॉक्टर के पास जाते थे. हर वक्त सिर दुखता था. कंधे भारी रहते थे. आंखों में जलन होती थी. पूरे शरीर में खुजली मारती थी. दवाओं पर पानी की तरह पैसा बहाया, बेटा. पर आराम नहीं हुआ. बाबा की शरण में आए तो जिंदगी बदल गई.' पड़ोसी या रिश्तेदार आपकी ऐसी हालत पर क्या कहते थे? 'मुसीबत में कौन किसका होता है. सब मतलब के यार हैं. पड़ोसी घर का पानी तक नहीं पीते थे. रिश्तेदारों ने मुंह फेर लिया था. न किसी शादी में जाते, न किसी को घर बुलाते. लगता था समाज ने बहिष्कार कर दिया है. किससे क्या शिकायत करते. वक्त खराब था. चुप ही रहे.'
अचानक बंद हो गई थी जुबान, बोलने भी नहीं देते थे भूत-प्रेत यहां इलाज के लिए आई एक महिला ने नाम न बताने की शर्त पर बताया कि कुछ सालों पहले अचानक एक दिन उसकी जुबान बंद हो गई. काफी कोशिशों से भी वह कुछ बोल नहीं पा रही थीं. जब बोला नहीं गया तो इशारों से परिवार को बताया. इसके बाद पड़ोस के ही एक बाबा ने झाड़-फूंक से इलाज किया. वो फिर से बोलने लगीं. वो दिन इन सब चीजों की शुरुआत थी.
इस घटना के कुछ दिनों बाद ही एक रात महिला को शरीर पर कुछ हावी महसूस हुआ. कंधे काफी ज्यादा भारी होने लगे. सिर में तेज दर्द था. इसके बाद उन्हें दौरा पड़ गया. दौरा पड़ने के बाद से सामान्य होने तक उसे कोई होश नहीं था. बाद में परिवार ने ही बताया कि वह मर्दों की आवाज में जोर-जोर से चीख रही थी.
चीखते हुए कह रही थी, 'हम इसे अपने साथ लेकर चले जाएंगे.' महिला का परिवार यह सब देखकर सहम चुका था. परिवार वालों ने बताया, इस रात के बाद अक्सर महिला को प्रेत संकट के दौरे पड़ने लगे. दौरा पड़ते ही उसकी आवाज में अचानक बदलाव आ जाता था. महिला की आंखें इतनी लाल हो जाती थी कि परिवार का कोई भी इंसान उसे पकड़ने तक की हिम्मत नहीं करता था.

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