
यूपी के एडहॉक टीचर्स ने की सेवा बहाली की मांग, शिक्षकों को कई महीने से नहीं मिला है वेतन
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यूपी में 2000 से ज्यादा तदर्थ शिक्षक असमंजस में हैं. क्योंकि उनकी सेवा समाप्त कर दी गई है. फिर भी वेलोग लगातार स्कूलों में पढ़ा रहे हैं और वेतन भुगतान की मांग कर रहे हैं. उन्हें कई महीनें से वेतन नहीं मिला है. वहीं सरकार का कहना है कि वो अस्थायी तौर पर एक न्यूनतम मानदेय पर अपनी सेवा दे सकते हैं.
उत्तर प्रदेश के तदर्थ यानी एडहॉक शिक्षक लंबे समय से वेतन और सेवा बहाली की मांग को लेकर आंदोलनरत हैं. सरकार ने 9 नवंबर 2023 को जारी एक शासनादेश के तहत वर्ष 1993 से 2020 तक कार्यरत लगभग 2,090 तदर्थ शिक्षकों की सेवाएं समाप्त कर दी थी.
अब शिक्षकों को 25 और 30 हजार अस्थायी मानदेय दिए जाने का प्रपोजल दिया गया है. ऐसे में ये शिक्षक जिस विद्यालय में एक लाख से सवा लाख वेतन पा रहे थे, वहीं अब चतुर्थ वर्गीय कर्मी की सैलरी से भी कम अस्थायी मानदेय पर राजी नहीं हैं. शिक्षक आज भी लगातार स्कूलों में पढ़ा रहे हैं, लेकिन उन्हें दो वर्षों से सैलरी नहीं मिली है.
22 महीनों से नहीं मिला है वेतन शिक्षकों का कहना है कि वर्ष 2000 के बाद नियुक्त तदर्थ शिक्षकों को पिछले 22 महीनों से वेतन भुगतान नहीं किया गया है. उनका कहना है कि सरकार इस मुद्दे पर कोई विचार नहीं कर रही है. हालात यह हैं कि वेतन न मिलने से शिक्षकों के परिवार आर्थिक, मानसिक और शारीरिक संकट झेल रहे हैं.
कई शिक्षक अपने माता-पिता की दवा, बेटियों की शादी और बच्चों की पढ़ाई का खर्च उठाने में असमर्थ हो चुके हैं. शिक्षकों ने आरोप लगाया है कि वर्ष 2000 से पहले के तदर्थ शिक्षकों का वेतन हाईकोर्ट के आदेश पर दिया जा रहा है, जबकि 2000 के बाद नियुक्त शिक्षकों की अनदेखी की जा रही है. जबकि 1993 से लेकर 2025 तक माध्यमिक शिक्षा में नियुक्त शिक्षक एक समान हैं.
वेतन नहीं मिलने से हो रही है परेशानी शिक्षकों का कहना है कि इस विसंगति के चलते दर्जनों शिक्षक असमय दिवंगत हो चुके हैं और सैकड़ों गंभीर बीमारियों से जूझ रहे हैं. बाराबंकी के रहने वाले सत्येंद्र सिंह, जिन्हें पिछले दो वर्षों से सैलरी नहीं मिल रही है. बच्चे को पढ़ने के लिए, ट्यूशन फीस के लिए और दवाई तक के लिए पैसे नहीं हैं. सत्येंद्र सिंह प्रधानाचार्य के पद पर तैनात थे. इसके बावजूद भी आज हालत ये है कि घर में खाने के लिए भी पैसे नहीं.
लखनऊ इंदिरा नगर में रहने वाले शिक्षक कुलदीप सिंह की भी यही समस्या है. घर में बीमार पिता की दवाई और इलाज के लिए पैसे नहीं जुटा पाए. इस वजह से वो समय से पहले चल बसे.

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