
यूक्रेन और ग्रीनलैंड मोहरा, क्या रूस-अमेरिका की रस्साकशी से दुनिया फिर दो ध्रुवों में बंटेगी?
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दिसंबर 2025 में डोनाल्ड ट्रंप ने रूस और यूक्रेन में मध्यस्थता की भरसक कोशिश की. साथ ही उन्होंने साफ कहा कि यूक्रेन के पास एक ही रास्ता है, वो अपना कुछ हिस्सा मॉस्को के हवाले कर दे. इधर ट्रंप की लीडरशिप में अमेरिका खुद भी कई देशों पर अपना ठप्पा चाह रहा है.
रूस और यूक्रेन युद्ध को चार साल होने को हैं. मॉस्को चाहता है कि क्रीमिया के अलावा डोनबास भी उसका हो जाए, वो भी यूक्रेन की आधिकारिक मंजूरी के साथ. इधर शांति का सफेद झंडा लेकर चलने के बावजूद अमेरिका अपनी जमीनें बढ़ाना चाह रहा है. कई देशों पर दबाव है कि वे एक पाला चुन लें. तो क्या बड़ी मुश्किल से मल्टीपोलर हुई दुनिया वापस पुराने फ्रेम में लौट सकती है?
फरवरी 2022 में व्लादिमीर पुतिन ने जब रूस पर हमला किया तो इरादा साफ था, और मकसद करीब. कम से कम पुतिन को यही लगा. ठीक दस साल पहले भी मॉस्को ने कीव पर अटैक करते हुए क्रीमिया पर अपनी सेना खड़ी कर दी थी. अब रूस को डोनबास चाहिए था. यह वो इलाका है, जहां रूसी बोलने वाली आबादी ज्यादा है और जाहिर तौर पर खुद को मॉस्को के करीब मानती है. दस साल बाद यानी इस अटैक के बारे में माना जा रहा था कि युद्ध कुछ ही दिनों में रुक जाएगा, जब रूस को उसका इच्छित मिल सकेगा.
फिर ऐसा क्यों नहीं हुआ यूक्रेन पर हमला इस बार यूरोप के लिए डराने वाला साबित हुआ. यूरोपीय संघ को डर है कि यूक्रेन से आगे बढ़ते हुए रूस यूरोप के बाकी देशों में भी घुसपैठ कर सकता है. उसने भर-भरकर सैन्य और आर्थिक मदद देनी शुरू कर दी ताकि यूक्रेन लड़ता रहे. अमेरिका में युद्ध की शुरुआत में जो बाइडेन सरकार थी. उसने भी भारी सहायता दी. फ्रंट फेस यूक्रेन रहा, लेकिन जंग रूस बनाम वेस्ट हो चुकी थी. अमेरिका में ट्रंप प्रशासन के आते ही तस्वीर बदली.
अब यूएस मध्यस्थता कर रहा है, वो भी ऐसी जिसमें रूस की शर्तें पूरी हो जाएं. यानी रूस के पास यूक्रेन का बड़ा हिस्सा आ जाए. पुतिन फिलहाल जो चाहते हैं, वो हुआ तो मौजूदा कीव का 20 फीसदी से भी बड़ा भाग कट जाएगा. इसके बाद भी रूस रुकेगा, इसकी कोई गारंटी नहीं.
अब बात आती है अमेरिका की ट्रंप अपनी दूसरी पारी में खासे आक्रामक हैं. वे अमेरिका को पचास राज्यों तक सीमित नहीं रखना चाहते, बल्कि उसमें कई और चीजें जोड़ना चाहते हैं. उन्होंने पहले कनाडा के साथ मजाक शुरू किया और कहा कि ये देश चाहे तो यूएस का 51वां स्टेट बन सकता है. बात भले ही हंसी-हंसी में कही जा रही थी, लेकिन इरादा साफ दिखने लगा. कनाडा नहीं, लेकिन अमेरिका ने पनामा और ग्रीनलैंड को हासिल करने की बात कर दी.
क्यों चाहिए ग्रीनलैंड और पनामा

ऑपरेशन सिंदूर के महज चार दिन बाद 14 मई 2025 को शाम 4:59 बजे पाकिस्तान ने अमेरिका के साथ अपने संबंधों को रीसेट करने की कोशिश की थी, जिसमें वह काफी हद तक कामयाब भी रहा. पाकिस्तान की इस कोशिश का एक महत्वपूर्ण हिस्सा पूर्व अमेरिकी राजदूत पॉल डब्ल्यू. जोन्स की ओर से विदेश विभाग को भेजा गया एक खास ईमेल था. इस ईमेल के जरिए पाकिस्तानी सेना प्रमुख जनरल आसीम मुनीर की आगामी वाशिंगटन यात्रा के एजेंडे और रणनीतिक बिंदुओं पर चर्चा की थी.

अमेरिका ने ईरान पर 25 प्रतिशत टैरिफ लगाकर एक बड़ा आर्थिक हमला किया है. राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की इस नई नीति का असर भारत समेत करीब 147 देशों पर पड़ेगा जो ईरान के साथ व्यापार करते हैं. ईरान तेल और गैस समेत कई उत्पादों का बड़ा निर्यातक है और ओपेक देश भी है. भारत और ईरान के बीच व्यापार पिछले पांच सालों में 84 प्रतिशत तक गिर चुका है. भारत मुख्य रूप से ईरान को बासमती चावल, चाय, चीनी, दवाइयां और इलेक्ट्रॉनिक उपकरण निर्यात करता है, जबकि ईरान से सूखे मेवे और केमिकल्स आयात करता है.

मुस्लिम ब्रदरहुड पर ट्रंप सरकार की बड़ी कार्रवाई, मिडिल ईस्ट में एक्टिव 3 ब्रांच को घोषित किया आतंकी
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राजदूतों को तलब करने का ये कदम ऐसे समय में आया है जब ईरान के कुछ हिस्सों में विरोध प्रदर्शन कई दिनों से जारी हैं. बता दें कि पिछले हफ्तों में विदेशों के कई देशों ने प्रदर्शनकारियों के लिए सकारात्मक बयान दिए थे, जिससे तेहरान प्रशासन नाराज चल रहा है. विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने जारी बयान में कहा कि हम शांतिपूर्ण प्रोटेस्ट का समर्थन करते हैं, लेकिन हिंसा, तोड़फोड़ और सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने को नहीं.

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