
मोदी सरकार की 2015 में कतर से हुई वो डील, जिसके तहत भारत लाए जा सकते हैं 8 नेवी वेटरन
AajTak
कतर में गिरफ्तार किए गए भारतीय नौसेना के पूर्व अधिकारियों की फांसी की सजा को बदल दिया गया है. अब उन्हें वहां फांसी नहीं होगी. ऐसे में अब भारत और कतर के बीच हुई उस संधि के बारे में चर्चा शुरू हो गई है, जो दोनों देशों के बीच 2015 में साइन की गई थी.
कतर में अरेस्ट हुए भारतीय नौसेना के पूर्व अधिकारियों फांसी की सजा पर रोक लग गई है. लेकिन अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या इन पूर्व भारतीय नेवी अफसरों की किसी तरह से भारत वापसी हो सकती है. इस बात पर मुहर फिलहाल मुश्किल है, लेकिन भारत की तरफ से इसकी कोशिशें की जा सकती हैं. ऐसा इसलिए क्योंकि साल 2015 में भारत और कतर के बीच एक करार पर हस्ताक्षर हो चुके हैं, जिसके तहत कतर की जेल में बंद भारतीय कैदियों को भारत और भारत की जेलों में बंद कतर के कैदियों को कतर भेजे जाने की मांग की जा सकती है. आइए आपको बताते हैं आखिर यह कानून क्या है और कब भारत और कतर के बीच यह समझौता हुआ था.
पहले फांसी फिर बदली सजा
कतर में गिरफ्तार किए गए भारतीय नौसेना के पूर्व अधिकारियों को पहले वहां फांसी की सजा दी गई थी. तब मुश्किल यह थी कि अगर कतर की कोर्ट अपने इस फैसले पर कायम रहती तो पूर्व अफसरों को भारत वापस ला पाना काफी मुश्किल हो जाता. हालांकि, अब कतर की अदालत ने अपने फैसले को बदलते हुए फांसी की सजा पर रोक लगा दी है. लेकिन सभी पूर्व नेवी अफसर कतर की जेल में ही बंद हैं. समझौते का क्या मिलेगा लाभ
दरअसल, भारत में नरेंद्र मोदी सरकार बनने के बाद 2 दिसंबर 2014 को मोदी कैबिनेट की बैठक हुई. इस बैठक में कतर के साथ कैदियों की अदला-बदली संधि (Treaty on transfer of Sentenced Persons) पर मुहर लगाई गई. संधि पर मुहर लगने के बाद अगले ही साल 24 मार्च 2015 को कतर के अमीर शेख तमीम बिन हमद अल थानी भारत के दौरे पर आए. इस दौरान भारत और कतर के बीच कैदियों के प्रत्यर्पण को लेकर करार किया गया. इस संधि के मुताबिक अगर कतर की जेल में कोई भारतीय कैदी बंद है तो भारत उसे बाकी की सजा भुगतने के लिए भारत भेजने की मांग कर सकता है. ठीक ऐसा ही भारत को भी करना होगा. जैसे अगर कतर का कोई कैदी भारत में बंद है तो कतर उसे भेजने की मांग कर सकता है.
भारत की किन देशों के साथ है ये संधि?
भारत सरकार की अब तक कई मुल्कों के साथ इस तरह का संधि समझौता कर चुकी हैं. इन देशों में ब्रिटेन, मॉरीशस, बुल्गारिया, ब्राजील, कंबोडिया, मिस्र, फ्रांस, बांग्लादेश, दक्षिण कोरिया, सऊदी अरब ईरान, कुवैत, श्रीलंका, यूएई, मालदीव, थाईलैंड, तुर्की, इटली, बोस्निया और हर्जेगोविना, इजरायल, रूस, वियतनाम और ऑस्ट्रेलिया है. इसके साथ ही कनाडा, हॉन्गकॉन्ग, नाइजीरिया और स्पेन के साथ इस संधइ को लेकर बातचीत पूरी हो गई है.

ट्रंप ने वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम को संबोधित करते हुए कहा कि मुझे यूरोप से प्यार है लेकिन वह सही दिशा में आगे नहीं बढ़ रहा है. दुनिया हमें फॉलो कर बर्बादी के रास्ते से बच सकती है. मैंने कई मुल्कों को बर्बाद होते देखा है. यूरोप में मास माइग्रेशन हो रहा है. अभी वो समझ नहीं रहे हैं कि इसके क्या-क्या दुष्प्रभाव हो सकते हैं. यूरोपीयन यूनियन को मेरी सरकार से सीखना चाहिए.

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने स्विट्जरलैंड के दावोस में ग्रीनलैंड को लेकर बड़ा प्रस्ताव रखा है. उन्होंने साफ कहा है कि अगर ग्रीनलैंड अमेरिका को नहीं दिया गया तो वे यूरोप के आठ बड़े देशों पर टैरिफ लगाएं जाएंगे. इस स्थिति ने यूरोप और डेनमार्क को ट्रंप के खिलाफ खड़ा कर दिया है. यूरोप और डेनमार्क ने स्पष्ट कर दिया है कि वे ट्रंप के इस ब्लैकमेल को बर्दाश्त नहीं करेंगे.

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के विमान को एक तकनीकी खराबी की वजह से वापस वाशिंगटन लौट आया. विमान को ज्वाइंट बेस एंड्रयूज में सुरक्षित उतारा गया. ट्रंप के एयर फोर्स वन विमान में तकनीकि खराबी की वजह से ऐसा करना पड़ा. विमान के चालक दल ने उड़ान भरने के तुरंत बाद उसमें एक मामूली बिजली खराबी की पहचान की थी. राष्ट्रपति ट्रंप वर्ल्ड इकोनॉमिक फ़ोरम की बैठक में शिरकत करने के लिए स्विट्ज़रलैंड के दावोस जा रहे थे.

ग्रीनलैंड में आजादी की मांग दशकों से चल रही है. फिलहाल यह द्वीप देश डेनमार्क के अधीन अर्ध स्वायत्त तरीके से काम करता है. मतलब घरेलू मामलों को ग्रीनलैंडर्स देखते हैं, लेकिन फॉरेन पॉलिसी और रक्षा विभाग डेनमार्क सरकार के पास हैं. अब कयास लग रहे हैं कि डोनाल्ड ट्रंप की ग्रीनलैंड पर कब्जे की जिद के बीच वहां अलगाववाद को और हवा मिलेगी.

स्विटजरलैंड के दावोस में चल रहे WEF की बैठक में फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रों ने ट्रंप को बताया कि अमेरिका जैसी शक्ति को क्यों कानून आधारित वर्ल्ड ऑर्डर का सम्मान करना चाहिए. उन्होंने कहा कि आज की दुनिया में बहुपक्षवाद के बिखरने का डर सता रहा है. मैक्रों ने कहा कि दुनिया में जोर जबरदस्ती के बजाय सम्मान और नियम-आधारित व्यवस्था को प्राथमिकता देने की जरूरत है.

कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी के दावोस भाषण ने उस धारणा को तोड़ दिया कि वेस्टर्न ऑर्डर निष्पक्ष और नियमों पर चलने वाली है. कार्नी ने साफ इशारा किया कि अमेरिका अब वैश्विक व्यवस्था को संभालने वाली नहीं, बल्कि उसे बिगाड़ने वाली ताकत बन चुका है. ट्रंप के टैरिफ, धमकियों और दबाव की राजनीति के बीच मझोले देशों को उन्होंने सीधा संदेश दिया है- खुद को बदलो, नहीं तो बर्बाद हो जाओगे.







