
ग़्यासुद्दीन बलबन: एक ग़ुलाम के दिल्ली का सुल्तान बनने की कहानी - विवेचना
BBC
बलबन ने लंबे समय तक दिल्ली की गद्दी संभाली. लेकिन उससे पहले वो एक ग़ुलाम, सुल्तान के सलाहकार और वज़ीर भी रहे, इसके बाद कहीं जाकर उन्हें सल्तनत मिली.
इल्तुतमिश के सबसे छोटे बेटे नासिरुद्दीन महमूद के दिल्ली की गद्दी संभालते ही दिल्ली सल्तनत में राजनीतिक स्थिरता बहाल होनी शुरू हो गई थी, लेकिन इसमें सुल्तान महमूद की कोई ख़ास भूमिका नहीं थी.
यह काम किया था उसके सबसे ख़ास मंत्री ग़्यासुद्दीन बलबन ने जिसको महमूद के शासनकाल में सबसे अधिक ताक़त मिली हुई थी.
बलबन ने 1246 से लेकर 1287 तक चालीस सालों तक इस ताक़त का भरपूर इस्तेमाल किया, पहले दो दशक सुल्तान के प्रतिनिधि के तौर पर और अगले दो दशक दिल्ली के सुल्तान के तौर पर.
इस बीच सत्ता हासिल करने के उसके सफ़र में दो साल का व्यवधान पड़ा, जब वह अपने राजनीतिक विरोधियों की चालों के कारण क़रीब दो वर्षों तक सत्ता से बाहर रहा.
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बलबन के दौर के गवाह रहे इतिहासकार ज़ियाउद्दीन बर्नी अपनी किताब 'तारीख़-ए-फ़िरोज़शाही' में लिखते हैं, "नासिरुद्दीन महमूद ने जब गद्दी संभाली तो उसकी उम्र सिर्फ़ 17 साल की थी. उसमें न तो शासन करने का कोई गुण था और न ही दिलचस्पी. उसने शासन की पूरी ज़िम्मेदारी बलबन के ऊपर छोड़ दी थी."
"महमूद एक सौम्य, उदार और धार्मिक व्यक्ति था और उसका अधिकतर समय क़ुरान की प्रतियां बनाने में बीतता था. उस समय के उथल-पुथल वाले माहौल में ये गुण भले ही अच्छे समझे जाते हों, लेकिन सुल्तान के तौर पर इन गुणों को अनुपयुक्त माना जाता था. बलबन ने प्रतिद्वंद्वी दरबारियों की जलन और साज़िशों के बावजूद हालात पर नियंत्रण कर लिया."













