
क्या तालिबान का एनर्जी बूस्टर बन गया है पाकिस्तान? भारत को क्यों उठाना पड़ा ये कदम
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जुलाई में अफगानिस्तान के सरकारी सूत्रों के हवाले से दावा किया गया था कि तालिबान की मदद के लिए पाकिस्तानी आतंकवादियों को पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी ISI की तरफ से लगातार निर्देश दिये जा रहे हैं. ISI अफगानिस्तान में तालिबानी और पाकिस्तानी आतंकवादियों को भारत के बनाए प्रतिष्ठान और संपत्तियों को निशाना बनाने के लिए कहा जा रहा है.
अफगानिस्तान में हालात बेकाबू होने की वजह से भारत ने एक बड़ा फैसला लिया है. भारत ने अफगानिस्तान में रहने वाले भारतीयों के लिए घर वापसी का अलर्ट और दिशा निर्देश जारी कर दिए हैं. क्योंकि पिछले एक हफ्ते में तालिबान ने एक के बाद एक कई शहरों पर कब्जा कर लिया है. ऐसी खबरें हैं कि तालिबान को पाकिस्तान का भरपूर साथ मिल रहा है. पाकिस्तान के 20 हज़ार लड़ाके तालिबान की मदद के लिए भेजे गए हैं और इसमें आईएसआई (ISI) का भी हाथ है. अफगानिस्तान के हालात से पूरे मध्य एशिया में खलबली मचाई हुई है.
संयुक्त अरब अमीरात के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद जायेद अल नहयान के भारत दौरे ने पाकिस्तान में फिर से पुरानी डिबेट छेड़ दी है. पाकिस्तान के विशेषज्ञों का कहना है कि पाकिस्तानी नेतृत्व की वजह से हमें भारत की तुलना में हमेशा कमतर आंका जाता है. पाकिस्तान में इस दौरे को मिडिल ईस्ट मे पैदा हुए हालात और सऊदी अरब -पाकिस्तान के संबंधों के बरक्श देखा जा रहा है.

यूरोप में कुछ बेहद तेजी से दरक रहा है. ये यूरोपीय संघ और अमेरिका का रिश्ता है, जिसकी मिसालें दी जाती थीं. छोटा‑मोटा झगड़ा पहले से था, लेकिन ग्रीनलैंड ने इसे बड़ा कर दिया. डोनाल्ड ट्रंप लगातार दोहरा रहे हैं कि उन्हें हर हाल में ग्रीनलैंड चाहिए. यूरोप अड़ा हुआ है कि अमेरिका ही विस्तारवादी हो जाए तो किसकी मिसालें दी जाएंगी.

डोनाल्ड ट्रंप ग्रीनलैंड पर कब्जा चाहते हैं. उनका मानना है कि डेनमार्क के अधीन आने वाला यह अर्द्ध स्वायत्त देश अमेरिका की सुरक्षा के लिए जरूरी है. इसे पाने के लिए वे सैन्य जोर भी लगा सकते हैं. इधर ग्रीनलैंड के पास सेना के नाम पर डेनिश मिलिट्री है. साथ ही बर्फीले इलाके हैं, जहां आम सैनिक नहीं पहुंच सकते.

गुरु गोलवलकर मानते थे कि चीन स्वभाव से विस्तारवादी है और निकट भविष्य में चीन द्वारा भारत पर आक्रमण करने की पूरी संभावना है. उन्होंने भारत सरकार को हमेशा याद दिलाया कि चीन से सतर्क रहने की जरूरत है. लेकिन गोलवलकर जब जब तिब्बत की याद दिलाते थे उन्हों 'उन्मादी' कह दिया जाता था. RSS के 100 सालों के सफर की 100 कहानियों की कड़ी में आज पेश है यही कहानी.

यूरोपीय संघ के राजदूतों ने रविवार यानि 18 जनवरी को बेल्जियम की राजधानी ब्रुसेल्स में आपात बैठक की. यह बैठक अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की उस धमकी के बाद बुलाई गई. जिसमें उन्होंने ग्रीनलैंड को लेकर कई यूरोपीय देशों पर अतिरिक्त टैरिफ लगाने की बात कही है. जर्मनी और फ्रांस सहित यूरोपीय संध के प्रमुख देशों ने ट्रंप की इस धमकी की कड़ी निंदा की है.








