
उत्तर प्रदेश के बाराबंकी से जुड़े हैं ईरान के इतिहास के तार, जानें क्या है कनेक्शन?
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शिया धर्मगुरु सैयद अहमद मुसावी का जन्म उत्तर प्रदेश के बाराबंकी के पास किंटूर नामक एक छोटे से शहर में हुआ था. बीबीसी पत्रकार बाकर मोईन के अनुसार, मुसावी ने भारत के साथ अपना जुड़ाव दिखाने के लिए सरनेम के रूप में 'हिंदी' का इस्तेमाल किया. उनके पोते रुहोल्ला खुमैनी को आगे चलकर 1979 की ईरानी क्रांति का जनक कहा गया.
1979 में जब इस्लामी क्रांति के जनक रुहोल्ला खुमैनी ईरान में बड़े हो रहे थे तब उनका मुल्क एक लिबरल देश था. बचपन से ही खुमैनी का झुकाव आध्यात्मिकता की तरफ था. उनका शिया वर्ग से गहरा संबंध था, जो उन्हें अपने दादा सैयद अहमद मुसावी हिंदी से विरासत में मिला था. खुमैनी के दादा अहमद हिंदी का जन्म उत्तर प्रदेश के बाराबंकी के पास हुआ था. आगे चलकर वह ईरान चले गए. बाराबंकी में जन्मे हिंदी और उनकी शिक्षाओं ने ईरान के इतिहास को आकार देने में अहम भूमिका निभाई. उनके पोते खुमैनी ईरान के पहले सुप्रीम लीडर बने और इसे एक धार्मिक मुल्क में बदल दिया.
यह सब और ज्यादा दिलचस्प इसलिए हो जाता है क्योंकि दुनिया इस वक्त ईरान की ओर देख रही है. सवाल उठ रहा है कि रविवार को एक हेलीकॉप्टर क्रैश में राष्ट्रपति इब्राहिम रईसी की मौत के बाद वर्तमान सुप्रीम लीडर और खुमैनी के उत्तराधिकारी अयातुल्ला अली खामेनेई की विरासत कौन संभालेगा.
यूपी के एक जिले से जुड़े हैं ईरान के इतिहास के तार
खामेनेई के उत्तराधिकारी की दौड़ में रईसी दो दावेदारों में से एक थे. दूसरा खामेनेई का दूसरा बेटा मोजतबा है. खामेनेई के पूर्वाधिकारी खुमैनी थे जिन्होंने ईरान को एक कट्टरंथी शिया मुल्क और मिडिल ईस्ट में एक वैकल्पिक शक्ति केंद्र में बदल दिया. अगर खुमैनी के दादा अहमद हिंदी ईरान नहीं गए होते तो यह मुल्क अपना वर्तमान स्वरूप नहीं ले पाता. यह बेहद अजीब और दिलचस्प है कि कैसे ईरान के इतिहास के तार उत्तर प्रदेश के एक जिले से जुड़े हुए हैं.
1830 में बाराबंकी से ईरान गए थे मुसावी
शिया धर्मगुरु सैयद अहमद मुसावी का जन्म उत्तर प्रदेश के बाराबंकी के पास किंटूर नामक एक छोटे से शहर में हुआ था. बीबीसी पत्रकार बाकर मोईन के अनुसार, मुसावी ने भारत के साथ अपना जुड़ाव दिखाने के लिए सरनेम के रूप में 'हिंदी' का इस्तेमाल किया. उनके पोते रुहोल्ला खुमैनी को आगे चलकर 1979 की ईरानी क्रांति का जनक कहा गया. उन्होंने पश्चिम एशियाई देश को हमेशा के लिए एक धर्मतंत्र में बदल दिया. अहमद मुसावी हिंदी 1830 में बाराबंकी से ईरान गए थे.

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