
इतनी कमेटियां, हजारों स्कूल… क्या मिलेगा पैरेंट्स को इंसाफ? नए फीस रेगुलेशन एक्ट पर क्या कहते हैं एक्सपर्ट
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ये कानून आम लोगों से जुड़ा है और उससे पहले पब्लिक कंसल्टेशन जरूरी था. पेरेंट्स सड़कों पर विरोध कर रहे हैं तो क्या ये जरूरी नहीं था कि उनकी राय ली जाती? वे मानते हैं कि सरकार ने इसे बहुत जल्दबाजी में ला दिया और अक्सर जो काम जल्दीबाज़ी में होता है, उसमें गड़बड़ी की गुंजाइश ज्यादा होती है.
दिल्ली सरकार के नए फीस रेगुलेशन बिल को लेकर अभिभावकों में उम्मीद जरूर जगी है लेकिन शिक्षा क्षेत्र में काम करने वाले कई वकील एक्टिविस्ट और पेरेंट्स एसोसिएशन इसे जल्दबाजी में लाया गया कदम मानते हैं. आइए जानते हैं क्या कहते हैं एक्सपर्ट्स...
बिल से पहले कंसल्ट क्यों नहीं किया गया?
ऑल इंडिया पेरेंट्स एसोसिएशन के अध्यक्ष व सुप्रीम कोर्ट के एडवोकेट अशोक अग्रवाल का कहना है कि ये कानून आम लोगों से जुड़ा है और उससे पहले पब्लिक कंसल्टेशन जरूरी था. पेरेंट्स सड़कों पर विरोध कर रहे हैं तो क्या ये जरूरी नहीं था कि उनकी राय ली जाती? वे मानते हैं कि सरकार ने इसे बहुत जल्दबाजी में ला दिया और अक्सर जो काम जल्दीबाज़ी में होता है, उसमें गड़बड़ी की गुंजाइश ज्यादा होती है.
कितनी कमेटी, कितनी दौड़?
बिल में तीन लेवल की कमेटी बनाने की बात है जो स्कूल लेवल, डिस्ट्रिक्ट लेवल और स्टेट लेवल काम करेंगी. इस पर अशोक अग्रवाल कहते हैं कि ये कोई दीवानी मुकदमा नहीं है कि पहले सिविल कोर्ट, फिर सेशन कोर्ट, फिर हाईकोर्ट,सुप्रीम कोर्ट तक जाएं. ये बच्चों की फीस का मामला है जिसमें पेरेंट्स कितनी दूर तक भागते फिरेंगे?.
वे सवाल उठाते हैं कि इतनी सारी कमेटी बनाकर सरकार क्या आउटपुट देना चाहती है? उनका मानना है कि एक ही प्रभावी कमेटी काफी होती जैसे कि पहले जस्टिस अनिल देव कमेटी थी जिसे हाईकोर्ट ने बनाया था और जिसने बेहतर काम किया.

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