
Hello Bachhon Review: विनीत कुमार सिंह है इस सीरीज के माथे का चंदन, कहीं कोटा फैक्ट्री तो कहीं बिजनेस एम्पायर का फील देती सीरीज
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Hello Bachhon Review: विनित कुमार सिंह की मच अवेटेड सीरीज हैलो बच्चों रिलीज हो गई है. इसे देखने से पहले इसका रिव्यू यहां पढ़ लीजिए.
फिल्म छावा का एक डायलॉग है- तुम नमक नहीं चंदन हो कवि, तुम तिलक हमारे माथे का, इस सीरीज में विनीत कुमार सिंह ने यही किया है, वो इस सीरीज की जान हैं. वो इतने ज्यादा अलख पांडेय लगे हैं कि जब लास्ट में असली वाले आते हैं तो वो उनके सामने डुप्लीकेट लगने लगते हैं. ये सीरीज एजुकेशन सिस्टम पर बात करती है लेकिन सच तो ये है कि जिनपर ये सीरीज बनी है वो खुद बहुत बड़े बिजनेस एम्पायर के मालिक हैं. क्या ये सीरीज अलक पांडेय को महान बताने के लिए बनाई गई है, पूरा रिव्यू पढ़िए
कहानीये कहानी है अलख पांडेय की, कैसे एक गरीब लड़का यू ट्यूब से पढ़ाना शुरू करता है और फिर फिजिक्स वाला बन जाता है. लाखोे बच्चे उससे पढ़ना चाहते हैं, वो गरीब बच्चों को पढ़ाना चाहते हैं, उसे लगता है ये तो उनका हक है. उसकी जर्नी कैसे शुरू हुई ,क्या दिक्कतें आई, किसने साथ दिया, किसने साथ छोड़ा, परिवार का क्या रोल रहा, ये सब आपको इस सीरीज में देखने को मिलेगा.
कैसी है ये सीरीजये एक ठीक ठाक सीरीज है. ये सीरीज शुरू होती है तो कमाल लगती है, कुछ बहुत गरीब बच्चों की कहानी दिखाई जाती है और साथ साथ अलख पांडेय का ट्रैक चलता है. आपको देखकर हैरानी होती है कि हमारे देश में अभी भी इस हालात में बच्चे रहते हैं, और पढ़ना चाहते हैं. उन कहानियों से आप कनेक्ट करते हैं लेकिन दो एपिसोड के बाद ये सीरीज कोटा फैक्ट्री बन जाती है. अलख पांडेय और जीतू भैया में फर्क करना मुश्किल हो जाता है. आपको लगता है ये सब तो हम देख चुके हैं. ये सीरीज राइट टू एजुकेशन की बात करती है. गरीब बच्चों को कम पैसों में पढ़ाने की बात करती है लेकिन ये सीरीज जिनपर बनी है वो खुद करोड़ों की कंपनी के मालिक हैं तो आपको कुछ कुछ चीजें जरा खटकती हैं. क्योंकि ये सब पर्दे पर जितना अच्छा लगता है असल जिंदगी में उतना ही मुश्किल होता है. क्या ये सीरीज अलख पांडेय को महान दिखाने की कोशिश करती है तो जी हां बिल्कुल करती है. ये सीरीज सिर्फ बताती है कि वो तो सिर्फ पढ़ाना चाहते हैं. ये नहीं बताती है कि वो इतने बड़े बिजनेसमैन कैसे बने. सीरीज में उनकी मौजूदगी ये भी बताती है कि सीरीज उनकी देख रेख में ही बनी है, तो ये सीरीज मोटीवेट तो करती है, बच्चों पर पढ़ाई के प्रेशर की बात भी करती है लेकिन वो असर नहीं छोड़ पाती जो कोटा फैक्ट्री छोड़ पाई थी और वो भी टीवीएफ ने ही बनाई थी.
एक्टिंगविनीत कुमार सिंह इस सीरीज की जान हैं, वो इतने कमाल के हैं कि असली वाले उनके आगे डुप्लीकेट लगते हैं. विनीत ने इस किरदार को अलग तरह से निभाया है, वो इस किरदार को जैसे जी गए हैं, एक टीचर की बॉडी लैंग्वेज को उन्होंने कमाल तरीके से पकड़ा है. विनीत की एक्टिंग इस सीरीज को अपलिफ्ट करती है. अगर विनीत ना होते तो ये एक एवरेज सीरीज बनकर रह जाती. विक्रम कोचर का काम काफी अच्छा है, वो भी बताते हैं कि उनकी एक्टिंग रेंज जबरदस्त है. अनुमेहा जैन ने अच्छा काम किया है. गिरीज ओक ने अच्छा और सधा हुआ अभिनय किया है. पकंज कश्यप इम्प्रेस करते हैंय

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